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प्रदूषण बनाम टैरिफ

अर्थव्यवस्था व सेहत पर घातक असर

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दावोस में हाल ही में संपन्न वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में भारतीय अर्थव्यवस्था की चर्चा के दौरान यह बात शिद्दत से उठी कि भारत पर ट्रंप के टैरिफ के मुकाबले प्रदूषण ज्यादा घातक असर दिखा रहा है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर और आईएमएफ की पूर्व डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर गीता गोपीनाथ ने इकोनॉमिक फोरम में चर्चा के दौरान कहा कि व्यापार बढ़ाने की कवायद में अकसर व्यापारिक बाधाओं और नियमों की बात की जाती है, लेकिन आर्थिक तरक्की में बाधक प्रदूषण जैसे घटकों की चर्चा कम ही होती है। चर्चा में भारत में प्रदूषण की भयावहता का जिक्र करते हुए कहा गया कि भारत पर ट्रंप द्वारा लगाए गए टैरिफ के मुकाबले प्रदूषण का असर ज्यादा घातक व दूरगामी है। फोरम में साल 2022 में विश्व बैंक के एक अध्ययन का हवाला दिया गया कि भारत में हर साल सत्रह लाख लोगों की मौत प्रदूषण से हो जाती है। ये आंकड़ा भारत में मरने वालों का अट्ठारह फीसदी बैठता है। जो कहीं न कहीं आर्थिक गतिविधियों को बाधित करने के साथ ही बहुमूल्य जीवन भी लीलता है। कमोबेेश यह घातकता जीडीपी पर भी असर डालती है। निस्संदेह, प्रदूषण से होने वाली मौतों से केवल एक परिवार ही नहीं, पूरे देश पर प्रभाव पड़ता है। देश की श्रम शक्ति का ह्रास होता है और आर्थिकी पर दूरगामी प्रभाव होते हैं। वहीं आर्थिकी पर चर्चा के दौरान यह मुद्दा भी उठा कि प्रदूषण के चलते निवेशकों के भरोसे पर भी दुष्प्रभाव होता है। इससे निवेशकों का आकर्षण कम होता है। निस्संदेह, निवेशक के मन में भय होता है कि यदि वह इसी प्रदूषित वातावरण में रहता है तो यह उसके लिये यह घातक हो सकता है। इसमें दो राय नहीं कि प्रदूषण की भयावह स्थिति दुनिया में किसी भी देश की छवि को नुकसान जरूर पहुंचाती है। जिससे निवेशक बेहतर विकल्प की तलाश में अन्य देशों का रुख कर सकते हैं। ऐसे में प्रदूषण के संकट को युद्धस्तर पर निपटाने की जरूरत महसूस की जा रही है।

निस्संदेह, भारत में प्रदूषण का संकट एक यथार्थ है। यह भी हकीकत है कि देश के नीति-नियंता प्रदूषण संकट के समाधान को लेकर गंभीर नजर नहीं आते। जब-जब प्रदूषण संकट गहराता है तो आग लगने पर कुआं खोदने की कवायद की जाती है। कोर्ट की फटकार व नियामक एजेंसियों की सख्ती के बाद शासन-प्रशासन हरकत में आता है। लेकिन गीता गोपीनाथ के तर्कों के कुछ अर्धसत्य भी हैं। इसमें दो राय नहीं कि अमेरिका के इशारे पर काम करने वाली वैश्विक एजेंसियां विकासशील देशों को लेकर अपनी सुविधा के हिसाब से प्रतीक-प्रतिमान गढ़ती रही हैं। आईएमएफ जैसी संस्थाओं को अमेरिकी कूटनीति के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। यहां तक कि इन संस्थाओं में उच्च पदों पर बैठे भारतीय अधिकारी भी अमेरिका के सुरों में गाते नजर आते हैं। सवाल गोपीनाथ के बयान के समय का भी है जब अमेरिका न केवल भारत पर अन्यायपूर्ण टैरिफ लगा रहा है बल्कि द्विपक्षीय व्यापार समझौते को भी अपनी शर्तों के अनुरूप अंतिम रूप देने का प्रयास कर रहा है। बहरहाल, इसके बावजूद यह एक हकीकत है कि हमारे देश में प्रदूषण संकट बड़ा है, जिसे देश के नीति-नियंता गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। जिसके चलते करोड़ों भारतीयों को अपनी जमा-पूंजी अपने व परिवार के उपचार में खर्च करनी पड़ती है। निस्संदेह, प्रदूषण के खिलाफ युद्ध स्तर पर कार्रवाई करने की जरूरत है। साथ ही प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े कानूनों को सरल बनाने की भी जरूरत है ताकि उन पर अमल आसानी से हो सके। इसके अलावा लोगों को भी जागरूक करने की जरूरत है कि देश की आबोहवा सुधारने के लिये उन्हें भी कुछ त्याग करने होंगे। उन्हें अपनी विलसिता की जीवन शैली में बदलाव लाकर आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुधारना होगा। निश्चित रूप से प्रदूषण को आर्थिक चुनौती के रूप में भी देखने की जरूरत है। खासकर जब भारत खुद को वैश्विक आर्थिक और विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने के लिये प्रयासरत है। हमारा मकसद हो कि हमारे शहर स्वच्छ रहें और नागरिकों के लिये जीवन परिस्थितियां स्वास्थ्य के अनुकूल हों।

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