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ज़हर बांटते उद्योग

बद्दी से पंजाब तक सतलुज में प्रदूषण

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कुछ उद्यमी मुनाफे की अंधी हवस में इतने स्वार्थी हो जाते हैं कि औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले कचरे को साफ किए बिना ही जलधाराओं में बहा देते हैं। जबकि उनकी नैतिक व कानूनी जिम्मेदारी बनती है कि उनकी फैक्ट्रियों से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थ पर्यावरण व नदी-नालों को प्रदूषित न करें। हिमाचल प्रदेश स्थित बद्दी-नालागढ़ इलाके में कई औद्योगिक इकाइयां नदियों में ज़हरीले रसायन लगातार बहाती रही हैं। यह प्रदूषणकारक कचरा सिरसा नदी में बहा दिया जाता है, जो कालांतर सतलुज नदी में चला जाता है। यही वजह है कि आज सतलुज का प्रदूषित पानी जो चेतावनी दे रहा है उसे पंजाब और हिमाचल प्रदेश की सरकारें भी नजरअंदाज नहीं कर सकती हैं। इसी आने वाले संकट के मद्देनजर ही बद्दी-नालागढ़ इलाके की अज्ञात औद्योगिक इकाइयों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। जो मामले की गंभीरता को ही दर्शाता है। निस्संदेह, यह संकट कोई नई समस्या नहीं हैं। जो हमारे पर्यावरण संरक्षण से जुड़े नियम व कानूनों को लागू करने में तंत्र की बार-बार होने वाली विफलता को ही दर्शाता है। बद्दी-बरोटीवाला-नालागढ़ क्षेत्र से होने वाले औद्योगिक प्रदूषण के प्रामाणिक रिकॉर्ड कई सालों से मौजूद हैं। दरअसल, यह जहरीला कचरा इस औद्योगिक क्षेत्र से गुजरने वाली सिरसा नदी में डाल दिया जाता है। सिरसा नदी इन प्रदूषक तत्वों को आगे की ओर बहा ले जाती है। कालांतर यह सतलुज नदी में जाकर मिल जाता है। इस बाबत कई बार जांच भी की गई। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की कार्यवाही में बिना ट्रीट किए गए रसायनयुक्त कचरे व ठीक से ट्रीट न किए गए कचरे के बारे में उल्लेख किया गया है। ट्रिब्यूनल ने नियमों का पालन न करने वाली इकाइयों तथा ट्रीटमेंट सिस्टम की खामियों की ओर इशारा किया है। दरअसल, फार्मास्युटिकल प्रदूषण की समस्या बेहद गंभीर मामला है, क्योंकि पारंपरिक ढंग से ट्रीटमेंट करने वाले सिस्टम से सक्रिय फार्मास्युटिकल तत्व और एंटीबॉयोटिक के अवशेष पूरी तरह से नहीं हट पाते हैं।

दरअसल, हाल के प्रकरण से एक और परेशान करने वाली विरोधीभासी बात सामने आई है। इस बाबत सूचना मिली थी कि रोपड़ हेडवर्क्स पर भारी मात्रा में जमा कचरे को नदी के बहाव की दिशा में बेफिक्री से छोड़ दिया गया। निस्संदेह, यदि यह कचरा नुकसानदायक था, तो इसे नदी में छोड़ने से समस्या महज एक जगह से दूसरी जगह स्थानांतरित ही हुई है। कायदे से हेडवर्क्स में जमा कचरे की वैज्ञानिक तौर-तरीकों से निगरानी की जानी चाहिए थी। सही मायने में प्रदूषणकारक कचरे को ठिकाने लगाने से पहले उसके सैंपल लेकर उसकी जांच-पड़ताल की जानी जरूरी थी। निश्चित रूप से यह संकट बड़ा है और तत्काल इसका समाधान किया जाना चाहिए था। वास्तव में इस मामले को हिमाचल बनाम पंजाब के बीच आरोप-प्रत्यारोप का खेल नहीं बनने दिया जाना चाहिए। जरूरत इस बात की है कि दोनों सरकारें मिलकर प्रदूषण फैलाने वाले कचरे का वास्तविक स्रोत तलाशें क्योंकि अभी तक कचरे के असली स्रोत का पता नहीं चल सका है। यही वजह है कि अभी अज्ञात औद्योगिक इकाइयों के खिलाफ ही प्राथमिकी दर्ज की गई है। लेकिन यह एक हकीकत है कि अज्ञात इकाइयों के खिलाफ एफआईआर दर्ज होना, दोषी होने का सबूत नहीं हो सकता। जरूरत इस बात की है कि पंजाब और हिमाचल के प्रदूषण नियंत्रण अधिकारी मिलकर साझी जांच करें। वहीं दूसरी ओर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को चाहिए कि वह इसकी स्वतंत्र रूप से निगरानी करे। आज आवश्यकता इस बात की है कि इस घटना के बाद बद्दी-सिरसा-सतुलज की पूरी चेन की लगातार निगरानी की जाए। वहीं दूसरी ओर मॉनसून के दौरान अचानक निरीक्षण, अनधिकृत औद्योगिक इकाइयों की पहचान करना और वैज्ञानिक तरीके से प्रदूषण के असली स्रोत का पता लगाया जाना चाहिए। साथ ही इस बात का भी प्रावधान हो कि बार-बार नियम तोड़ने वाले उद्यमियों पर कड़े आर्थिक दंड लगाए जाएं। उन्हें आपराधिक कृत्य के लिये परिणाम भुगतने के लिये तैयार रहने को भी कहा जाए। शायद तभी धरती, पानी और हवा को प्रदूषित करने वाले कारोबारियों की जवाबदेही तय की जा सकेगी।

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