Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
search-icon-img
Advertisement

दवा के दर्द

हरियाणा-हिमाचल के फार्मा उद्योग पर मार

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
Advertisement

खाड़ी में अमेरिका-इस्राइल व ईरान के बीच जारी संघर्ष का प्रभाव केवल पेट्रोलियम पदार्थों पर ही नहीं, कृषि से लेकर दवा उद्योग पर भी असर दिखाने लगा है। इस संघर्ष ने अब हिमाचल और हरियाणा के दवा उद्योग को भी अपनी चपेट में लेना शुरू कर दिया है। सर्वविदित है, ये क्षेत्र देश के दवा उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, खासकर लघु एवं मध्यम उद्यमों के माध्यम से। लेकिन पश्चिमी एशिया में जारी अशांति के चलते, प्रमुख कच्चे माल की आपूर्ति में अचानक गंभीर व्यवधान पैदा हो गया है। दरअसल, इस संकट के मूल में जरूरी फार्मास्यूटिकल अवयवों यानी एपीआई, सॉल्वैंट्स और पेट्रोकेमिकल डेरिवेटिव्स की कीमतों में भारी वृद्धि होना है। दरअसल, इनमें से कई कच्चे मालों की आपूर्ति पश्चिमी एशिया से होती है या इन देशों से लगते समुद्री मार्गों से होकर भारत पहुंचती है। एक तो इस इलाके में संघर्ष के चलते शिपिंग मार्गों पर भारी दबाव पड़ा है। वहीं ऊर्जा साधनों की कीमतों में अस्थिरता के चलते, कुछ क्षेत्रों में कच्चे माल की कीमतों में तीस प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है। खासकर पैकेजिंग सामग्री, जो अधिकांशत: पेट्रोलियम पदार्थों पर आधारित होती है, वह भी खासी महंगी हो गई है। जिसके चलते प्रतिस्पर्धा के कारण पहले कम लाभ के मार्जिन पर काम कर रहे दवा उद्योग पर अतिरेक दबाव पड़ गया है। लेकिन इस संकट का दूसरा पहलू यह है कि इस व्यवधान का असर उद्योग पर वित्तीय कारणों से ही नहीं है, बल्कि श्रमिकों से जुड़े कारणों से भी है।

दरअसल, इस संकट के बीच प्रवासी श्रमिक भी खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। ईंधन संकट और छोटे एलपीजी सिलेंडरों की आवश्यक आपूर्ति में बाधा का असर श्रमिकों के दैनिक जीवन और कार्य स्थिरता को लेकर पड़ना शुरू हो गया है। ऐसे में प्रवासी श्रमिकों पर अत्यधिक निर्भर फार्मा इकाइयों के लिये यह व्यवधान उत्पादकता में गतिरोध पैदा कर सकता है। वास्तव में देखा जाए तो उद्योग की मजबूती केवल आपूर्ति शृंखला से ही नहीं जुड़ी है बल्कि उनके श्रमिकों के हितों और उनके आत्मविश्वास से भी जुड़ी है। हिमाचल प्रदेश के बद्दी-बरोटीवाला-नालागढ़ क्षेत्र और हरियाणा के फार्मा क्लस्टर्स पर इसकी दोहरी मार पड़ रही है। जहां एक ओर उत्पादन लागत में भारी वृद्धि हुई है, वहीं दूसरी ओर छोटे निर्माताओं को उत्पादन में कटौती करने अथवा नुकसान उठाने के लिये मजबूर होना पड़ रहा है। दूसरी ओर बढ़ती लागत व वैश्विक परिवहन लागत में वृद्धि के कारण निर्यात प्रतिस्पर्धा में ये उद्योग पिछड़ रहा है। बहरहाल, इस संकट ने आयातित कच्चे माल और वैश्विक आपूर्ति शृंखला पर भारत की निर्भरता की कमजोरी को भी उजागर कर दिया है। हालांकि, केंद्र सरकार की पहल से आयातित कच्चे सामान पर शुल्क में छूट से भले ही कुछ राहत मिली हो, लेकिन कच्चे माल के वैकल्पिक स्रोत तलाशने, घरेलू एपीआई उत्पादन क्षमता बढ़ाने और प्रवासी श्रमिकों के लिये सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर व्यापक सुधार करने की आवश्यकता है। सही मायनों में एक दूर का युद्ध भारत की दवा आपूर्ति और उसके उत्पादकों के धैर्य की परीक्षा ले रहा है।

Advertisement

Advertisement
Advertisement
×