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बढ़ेंगी हमारी मुश्किलें

अर्थव्यवस्था व विदेश नीति होगी प्रभावित

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‘समरथ को नहिं दोष गुसाईं’ उक्ति की तर्ज पर ईरान पर हुए अमेरिकी-इस्राइली हमले को पश्चिमी देशों द्वारा तार्किक बताया जा रहा है। इस हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्ला खामेनेई तथा उनके परिजनों समेत कई लोगों की मौत को किसी भी तरह न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता। यह समय वैश्विक कानून-व्यवस्था के भंग होने और अमेरिका के साम्राज्यवादी मंसूबों के सिरे चढ़ने का है। जब से ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति बने हैं, उन्होंने वैश्विक संप्रभुता और संयुक्त राष्ट्र समेत दुनिया की तमाम नियामक संस्थाओं को बेबस बना दिया है। वेनेजुएला में हमला करके राष्ट्रपति निकोलेस मादुरो को गिरफ्तार करके अमेरिका ले जाने के बाद अब खामेनेई की परिवार समेत हत्या ने दर्शा दिया है कि दुनिया फिर जंगल-राज की तरफ बढ़ रही है। शक्ति बंदूक की नोक से निकलती दिख रही है। छोटे राष्ट्रों की संप्रभुता संकट में है। यूक्रेन पर रूसी आक्रमण, वेनेजुएला व ईरान पर अमेरिकी हमला बता रहा है कि आने वाले दिनों में ताइवान जैसे अन्य संकटग्रस्त देशों के सामने अस्तित्व बनाये रखने की चुनौती होगी। पूरी दुनिया में आपूर्ति शृंखला में आये व्यवधान तथा ट्रंप के टैरिफ आतंकवाद से दुनिया की अर्थव्यवस्था पहले ही चरमरा रही है। रोजगार के अवसर कम हुए हैं और लोगों को भारी महंगाई का सामना करना पड़ रहा है। ईरान पर अमेरिका-इस्राइल के हमले की प्रतिक्रिया मध्यपूर्व के अलावा पश्चिमी देशों में आने वाले समय में दिखाई देगी। जिसकी असली कीमत मानवता को ही चुकानी होगी।

निस्संदेह, आने वाले दिनों में भारत को ईरान-अमेरिकी संघर्ष की कीमत चुकानी होगी। इससे भारत की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं। भारत के लिये मुश्किल यह भी है कि ईरान पर हमला प्रधानमंत्री की इस्राइल यात्रा के तुरंत बाद हुआ है। जिससे भारत के लिये मध्यपूर्व को लेकर विदेश नीति में असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है। इसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। इससे हार्मुज स्ट्रेट रूट से भारत को होने वाली कच्चे तेल की आपूर्ति में बाधा उत्पन्न होगी। वहीं दूसरी ओर मध्यपूर्व में कार्यरत नब्बे लाख से अधिक भारतीयों पर प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभाव पड़ेगा और उनके द्वारा भारत भेजी जाने वाली धनराशि भी प्रभावित होगी। भारत द्वारा आयातित कच्चे तेल की पचास फीसदी आपूर्ति होर्मुज स्ट्रेट रूट से होती है। रूसी तेल खरीदने पर अमेरिकी दबाव के चलते भी इस रूट से भारतीय आपूर्ति बढ़ी है। इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने का सीधा असर भारत में कच्चे तेलों के दामों पर पड़ेगा। भविष्य में भारतीयों को तेल कीमतों में वृद्धि का सामना करना पड़ेगा। वहीं लाल सागर से होने वाली तेल आपूर्ति भी ईरान समर्थक हूती विद्रोहियों की धमकी से प्रभावित होगी। कूटनीतिक स्तर पर भी भारत को असहज स्थिति का सामना करना पड़ेगा। भारत इस समय ग्लोबल साउथ के नेतृत्व का दावा करता है और फिलहाल ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है, ईरान भी पिछले साल ब्रिक्स का सदस्य बन चुका है। ऐसे में क्या भारत इस हमले का विरोध करने की स्थिति में है? भारत ईरान से पुराने संबंधों के चलते क्या अमेरिका से दूरी बना सकता है?

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