कहने को तो देश डिजिटल क्रांति के दौर में पहुंच चुका है और वित्तीय लेनदेन से लेकर तमाम क्षेत्रों में आधुनिक तकनीक वरदान साबित हो सकती है। लेकिन हमें यह मानकर चलना चाहिए कि देश का परंपरागत किसान डिजिटल सुविधाओं के उपयोग में खुद को सहज महसूस नहीं करता। आधुनिक डिजिटल तकनीक का प्रयोग नई पीढ़ी की सोच के अनुरूप है, लेकिन पुरानी पीढ़ी इसके उपयोग में खुद को असहज पाती है। कमोबेश किसानों के कल्याण के लिए बनाये गए मंडी पोर्टलों पर भी यही बात लागू होती है। जाहिरा तौर पर किसानों के लिये मंडी पोर्टलों का उपयोग आसान होना चाहिए। बाकायदा किसानों को डिजिटल साक्षर बनाने की मुहिम चलाने की जरूरत भी है। सही मायनों में डिजिटलीकरण का मुख्य उद्देश्य कृषि उपजों की खरीद की प्रक्रिया को सरल बनाना था। लेकिन हरियाणा में जमीनी हकीकत इसके विपरीत नजर आ रही है। दरअसल, हम एक आम किसान से यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वह शहरी लोगों की तरह पोर्टलों, पासवर्डों और प्रक्रियात्मक पेचीदगियों के जाल का सहजता से उपयोग कर सके। यही वजह है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी का लाभ उठाने के लिये उसे एक जटिल प्रक्रिया का सामना करना पड़ा है। उल्लेखनीय है कि राज्य भर की मंडियों से द ट्रिब्यून में प्रकाशित हालिया रिपोर्टों से एक जैसा पैटर्न नजर आया है। अब राज्य में फसलों की बिक्री के लिये अनिवार्य पोर्टल- ई-खरीद और मेरी फसल,मेरा ब्योरा यानी एमएफएमबी- साइट क्रैश, डेटा विसंगतियों और सत्यापन की विफलताओं से ग्रस्त है। जिससे कई तरह की समस्याओं से किसानों को रूबरू होना पड़ रहा है। यहां तक कि कई जिलों में, किसानों को गेट पास तक नहीं दिए गए हैं। वजह यह बतायी जा रही है कि किसानों का रिकॉर्ड मेल नहीं खा रहा है। कई बार अंतिम व महत्वपूर्ण क्षणों में सर्वर ने काम नहीं किया। जिसका खमियाजा फसल बेचने आने वाले किसानों को उठाना पड़ रहा है।
दरअसल, ऐसी अनेक तकनीकी जटिलताओं के परिणाम तात्कालिक व गंभीर बताये जाते हैं। किसानों की फसल तो बिक्री के लिये तैयार है, लेकिन कतिपय कारणों से उसे मंडियों में प्रवेश करने में दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है। यही वजह है किसान अपने खून-पसीने की फसल निजी व्यापारियों को बेचने को विवश हो जाते हैं। किसान की मजबूरी ये होती है कि वह जल्द से जल्द फसल बेचना चाहता है। उसे अपने पहले के खर्च निकालने हैं और अगली फसल की तैयारी करनी है। जिसके चलते वह तुरंत भुगतान की आस में कम दाम में भी व्यापारियों को फसल बेचने को बाध्य हो जाता है। ऐसा नहीं है कि सरकारी एजेंसियां खरीद नहीं कर रही हैं, लेकिन फसल की आवक का एक छोटा हिस्सा ही खरीद पायी हैं। जो फसल खरीद के वायदे और वास्तविक तैयारी के बीच के अंतर को स्पष्ट करती है। कुछ आंकड़े इस बात की पुष्टि कर रहे हैं। विशेष रूप से, हरियाणा में गेहूं की खरीद को 80 लाख टन से घटाकर 72 लाख टन करने से किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर्याप्त रूप में नहीं मिल पा रहा है। जिसके चलते उन्हें आर्थिक घाटा उठाना पड़ रहा है। विडंबना यह है कि जो अनाज एमएसपी पर नहीं खरीदा जाता है, उसे किसान व्यापारियों को एमएसपी से 400 से पांच सौ रुपये कम दाम पर बेचने को मजबूर है। यानी एमएसपी के मूल उद्देश्य के विपरीत यह किसानों के हितों को नुकसान पहुंचा रहा है। इस बात में कोई संदेह नहीं कि डिजिटलीकरण का लक्ष्य व्यवस्था में पारदर्शिता और दक्षता लाना है। लेकिन इस प्रणाली की उपयोगिता तभी है जब सर्वर ठीक से काम कर रहा हो। साथ ही लोग इसका उपयोग बेहतर ढंग से करना जानते हों। यह प्रक्रिया छोटे और गरीब व निरक्षर किसानों को प्रोसेस से बाहर कर देती है। जिनकी सेवा का दावा व्यवस्था अक्सर करती है। एक विसंगति यह भी कि इसमें कोई बैकअप सिस्टम नहीं है। पोर्टल के फेल होने पर खरीद रुक जाती है। यदि एमएसपी का लाभ कमजोर डिजिटल प्रणाली की वजह से किसान को नहीं मिलता, तो यह किसानों का सुरक्षा कवच नहीं रह जाता है।

