पिछले दिनों सामने आई वह खबर विचलित कर गई कि दिल और रक्तचाप नियंत्रण की दवाइयों में गुणवत्ता की गिरावट पायी गई है। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन यानी सीडीएससीओ की ओर से मार्च माह के लिए जारी ड्रग अलर्ट में देश में बनी कई दवाइयों की क्वालिटी को लेकर सवाल उठे हैं। रिपोर्ट डराती है कि कुल 141 दवाओं के नमूने मानकों पर खरे नहीं उतरे हैं। इनमें शुगर, हार्ट, उच्च रक्तचाप, मिर्गी जैसे गंभीर रोगों का उपचार करने वाली दवाइयां भी शामिल हैं। इनमें इंजेक्शन व कफ सिरप भी शामिल हैं। कमोबेश यही स्थिति विटामिन व आयरन की गोलियों की भी रही। जिन राज्यों में उत्पादित घटिया दवाओं का खुलासा हुआ, उनमें हिमाचल प्रदेश पहले पायदान पर रहा, फिर उत्तराखंड, गुजरात, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, केरल, पुडुचेरी, तेलंगाना, सिक्किम, झारखंड, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, आंध्रप्रदेश, ओडिशा आदि राज्य शामिल हैं। यानी एक-दो राज्य नहीं, तमाम राज्यों के दवा उत्पादक इस अपवित्र कर्म में शामिल हैं। यूं कहें कि दाल में काला नहीं है बल्कि पूरी दाल काली है। विडंबना देखिए कि कफ सिरप के 17 नमूने फेल हुए हैं। अब यह साफ हो गया कि अफ्रीका व सेंट्रल एशिया के कुछ देशों तथा भारत के कुछ राज्यों में कफ सिरप पीने से बच्चों की मौत के जो आरोप भारतीय दवा कंपनियों पर लगे थे, वे गलत नहीं थे, जिससे पूरी दुनिया में भारतीय दवा उद्योग की छवि खराब हुई। इतना ही नहीं, टूथपेस्ट, मेहंदी व साबुन के नमूने तक फेल हुए हैं। कह सकते हैं कि दवा के नाम पर दर्द देने का कारोबार देश के विभिन्न भागों में खूब फल-फूल रहा है, जो नियामक एजेंसियों की कारगुजारियों पर सवाल उठाता है। कह सकते हैं कि यह अब सिर्फ स्वास्थ्य का ही मुद्दा नहीं रहा, यह जिंदगियों से खिलवाड़ के साथ देश की अर्थव्यवस्था को भी चोट पहुंचाता है।
निस्संदेह, घटिया दवाओं से किसी का बीमार होना एक व्यक्ति या परिवार की ही त्रासदी नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि कोई व्यक्ति सेहत सुधारने के लिए महंगी दवा का सेवन करे और उपचार के बाद और बीमार हो जाए। ये मरीज के विश्वास के साथ भी छल जैसा है। यह देश में सक्रिय खतरनाक तंत्र की ओर भी इशारा है जो पूरे देश में नकली व घटिया दवाओं के उत्पादन व आपूर्ति से जुड़ा है। वे चिकित्सक भी अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते जो ऐसी संदिग्ध दवाइयां मरीजों के उपचार के लिए लिखते हैं, जिनकी गुणवत्ता को लेकर शंका रहती है। कोरोना काल में हमने देखा था कि चंद रुपयों के लालच में घातक बीमारियों से ग्रस्त लोगों को नकली रेमडेसिविर के इंजेक्शन बेचे गए। कितना शर्मनाक है कि जानलेवा कैंसर की दवाइयों में घटिया व सस्ती एंटी-फंगल दवा मिलाकर बेची जा रही थी। गुरुग्राम में पिछले दिनों वजन घटाने वाले नकली इंजेक्शनों की बड़ी खेप बरामदगी हुई। देश में घातक दवाओं को बेचने वाला एक तंत्र सुनियोजित तरीके से काम कर रहा है। कोई मरे या जीए, उनकी बला से। उन्हें तो अपने मुनाफे से मतलब है। दरअसल, यह संकट एक राज्य का नहीं, पूरे देश के सामने मौजूद है। नियामक एजेंसियों की लापरवाही, कड़े कानूनों का अभाव व दोषियों को समय पर कड़ी सजा न मिलना इस अमानवीय धंधे के फलने-फूलने की वजह बन रहा है। निस्संदेह मानवता के खिलाफ होने वाले इस आपराधिक कृत्य में चिकित्सा तंत्र से जुड़े लोगों की भूमिका भी होगी। घटिया दवाओं का मिलना इस बात की ओर संकेत करता है कि व्यवस्था में शामिल काली भेड़ें इस अपवित्र कारोबार को प्रश्रय दे रही हैं। निगरानी तंत्र को चुस्त-दुरुस्त बनाकर और कानून के क्रियान्वयन में तेजी लाकर ही स्थिति को संभाला जा सकता है। आज देश में उपभोक्ताओं व मरीजों के तिमारदारों को जागरूक करने की जरूरत है कि वे दवा खरीदते समय मेडिकल स्टोर से बिल लें। दवाओं की पैकेजिंग की जांच-पड़ताल करें। संदेह होने पर संबंधित विभागों को शिकायत करके राष्ट्रीय दायित्व निभाएं। तभी दवा जीवन रक्षा का माध्यम बनी रह सकेगी।

