यूं तो हाल के वर्षों में आम भारतीय की अभिव्यक्ति में तल्खी व शोर का ग्राफ तेज हुआ है। अभिव्यक्ति का मुखर होना अच्छा है लेकिन उसका तल्ख होना, किसी की भी सेहत के लिए अच्छा नहीं है। वैसे हमारे परिवेश में लगातार बढ़ता शोर झेलना हमारी नियति हो चला है। सड़कों पर वाहनों के शोर, नये दौर के कर्कश संगीत से लेकर राजनीतिक विमर्श में होने वाले शोरगुल वाले संवाद से लेकर तमाम ऐसा कुछ घट रहा है, जो हमारी परेशानी का सबब बन रहा है। यूं तो कोई प्रमाणिक राष्ट्रव्यापी वैज्ञानिक शोध व्यापक रूप में हमारे सामने तो नहीं आए हैं जो ठीक-ठीक बताएं कि ध्वनि प्रदूषण हमारी सेहत पर कितना घातक असर डाल रहा है। लेकिन गाहे-बगाहे सामने आए आंकड़े इस बात की पुष्टि जरूर करते हैं कि लगातार बढ़ता शोर हमारी सेहत बिगाड़ रहा है। लेकिन इसके बावजूद इसे रोकने के लिए उचित निगरानी, समयबद्ध कार्रवाई और दंड के प्रावधान लागू होते नजर नहीं आते हैं। लेकिन विभिन्न अध्ययनों के निष्कर्ष बता रहे हैं देश के महानगरों से लेकर कस्बों तक हमारे परिवेश का शोर तय मानकों से कहीं अधिक है। जाहिरा तौर ये शोर हमारी सेहत को गहरे तक प्रभावित कर रहा है। जिससे न केवल हमारी श्रवण शक्ति कमजोर हो रही है बल्कि नींद में कमी, मानसिक तनाव, उच्च रक्तचाप के अलावा हृदय रोग तक का खतरा बढ़ रहा है। लेकिन इस दिशा में कागजों में तो लुभावनी योजनाएं तो बनायी जाती हैं लेकिन जमीनी हकीकत बदलती नजर नहीं आती। यह सुखद है कि पिछले दिनों देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में इस दिशा में नई पहल शुरू की गई है। दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति ने ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया आरंभ की है। दावा किया जा रहा है कि प्रदूषण के स्रोतों की कायदे से निगरानी होगी। इसके अलावा समयबद्ध ढंग से कार्रवाई होगी। साथ ही जुर्माना भी अनिवार्य रूप से वसूला जाएगा। ये तो आने वाला वक्त बताएगा कि अच्छी योजना कितनी जमीनी हकीकत बनती है।
लेकिन सवाल यह है कि जब देश में पहले से शोर नियंत्रण के कानून मौजूद हैं और हमारी अदालतें भी समय-समय पर हमारे नीति नियंताओं को आगाह करती ही रहती हैं, तो फिर सूरत क्यों नहीं बदलती। आखिर इन नियम-कानूनों के क्रियान्वयन में कहां खोट रह जाता है। यहां यह उल्लेखनीय है कि ध्वनि प्रदूषण विनियमन और नियंत्रण नियम, 2000 के तहत ध्वनि विस्तारक यंत्रों, निर्माण कार्यों और उद्योगों में इस्तेमाल की जाने वाली मशीनों, वाहनों के हार्न आदि अन्य स्रोतों को नियंत्रित करने का प्रयास किया गया था। ताकि लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण की रक्षा हो पाए। उल्लेखनीय है कि ये प्रावधान दिन व रात के लिये अलग-अलग हैं। जिसके अंतर्गत रात के दस बजे से लेकर सुबह छह बजे के मध्य लाउडस्पीकर लगाना मना है। यदि अपरिहार्य कारणों से कुछ अधिक समय के लिये इसका उपयोग किया भी जाना है तो संबंधित अधिकारी से अनुमति लेना अनिवार्य है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इन कानूनों का जमकर उल्लंघन करना शान समझा जाता है। जाहिर बात है कि जिन अधिकारियों की जिम्मेदारी इसकी निगरानी और रोकने के लिये होती है वे अपने दायित्वों को भलीभांति निर्वहन नहीं करते हैं। सख्ती के अभाव में लोग इसे न्यू नॉर्मल बना देते हैं। विडंबना यह है कि छोटे शहरों व कस्बों ही नहीं, बड़े शहरों में भी ध्वनि का स्तर नापने वाले यंत्र या तो लगे नहीं हैं, या फिर वे ठीक से काम नहीं कर रहे होते हैं। यही वजह है कि देश के सामने वह तस्वीर नहीं उभरती कि देश में ध्वनि प्रदूषण का स्तर कितना घातक हो चला है। जाहिर बात है कि देश में जब प्रामाणिक डाटा ही उपलब्ध नहीं है तो उसके निदान और उसके पड़ने वाले घातक प्रभावों की हकीकत कैसे सामने आएगी। वास्तव में गैर जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए। यदि वे फिर भी अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करते तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए।

