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सरसों का संकट

पंजाब के किसानों को आर्थिक संबल जरूरी

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एक समय था जब पंजाब के ग्रामीण अंचलों में खिले हुए सरसों के खेत मौसमी बयार में बदलाव के प्रतीक हुआ करते थे। तमाम सांस्कृतिक प्रतिमानों में पीले सरसों के खेतों को मौसम के गौरव के रूप में चित्रित किया जाता रहा है। लेकिन वक्त की विडंबना है कि यह अब यह सुनहरी फसल सिमटती नजर आ रही है। जिसके परिणाम स्वरूप आज देश में हम खाद्य तेलों की पर्याप्त आपूर्ति नहीं कर पा रहे हैं। यही वजह है कि भारत लगातार आयातित खाद्य तेलों पर अत्यधिक निर्भर होता जा रहा है। निश्चय ही यह स्थिति व्यवस्था के कई विरोधाभासों को भी उजागर कर रही है। यह तथ्य चौंकाता है कि पंजाब में सरसों के उत्पादन में इसलिए गिरावट नहीं आ रही है कि फसल उत्पादन क्षमता में किसी तरह की कोई कमी आई है। बल्कि यह स्थिति इसलिए है कि सरकारों की नीतियां प्रोत्साहन देने वाली साबित नहीं हो रही हैं। वहीं बाजार के रुझान इसे आर्थिक रूप से किसानों के हितों के प्रतिकूल बना रहे हैं। कहने को तो अकसर दलील दी जाती है कि पंजाब के किसानी से जुड़े संकटों का समाधान फसलों के विविधीकरण में निहित है। लेकिन विडंबना यह है कि विविधीकरण के दावों के बावजूद, सरसों के उत्पादक किसान प्रोत्साहन न मिल पाने से निराश हैं। दरअसल, किसान कम और अनिश्चित मुनाफे के चलते सरसों की फसल उगाने से गुरेज करता है। उसके सामने बड़ी चुनौती यह भी है कि सरसों की फसल की सरकारी खरीद सीमित मात्रा में होती है। जिसके चलते किसानों को खून-पसीने की उपज को बेचने के लिये व्यापारियों के रहमोकरम पर निर्भर रहना पड़ता है। वे अपने मोटे मुनाफे के लिये किसान के हितों की अनदेखी करने से नहीं चूकते। यही वजह है कि गेहूं और धान के विपरीत, जिनकी खरीद सुनिश्चित है और उनके लिये मजबूत विपणन प्रणाली मौजूद है, सरसों की फसल किसानों को बाजार की अस्थिरता के प्रति संवेदनशील बना देती है। फलत: किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।

दरअसल, इस संकट का दूसरा पहलू यह भी है कि पंजाब आज अपनी खाद्य तेल आवश्यकताओं का एक मामूली हिस्सा ही स्थानीय उत्पादन से पूरा करता है। इससे हमारी महंगे आयात पर निर्भरता और भी बढ़ जाती है। तिलहन की खेती को बढ़ावा देना अक्सर राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। सही मायनों में सरकारी तंत्र द्वारा सरसों की उपज की खरीद में सहायता और न्यायसंगत मूल्य दिलाने के वायदे खोखले साबित होने के कारण सरसों की पैदावार का रकबा बढ़ता नहीं है। जिस दिन किसानों को तंत्र की नीतियों पर भरोसा पैदा हो जाएगा, उस दिन निश्चय ही किसान प्रोत्साहन के चलते तर्कसंगत प्रतिक्रिया देंगे। निर्विवाद रूप से पंजाब की धरती में सरसों उत्पादन की स्थितियों से जुड़ी संभावनाएं पर्याप्त हैं। यकीनी तौर पर यह धान की तुलना में कम पानी की खपत करती है। साथ ही भूजल संकट को कम करने के उद्देश्य से फसल विविधीकरण से जुड़ी रणनीतियों में स्वाभाविक रूप से फिट बैठती है। लेकिन हमें इस हकीकत को स्वीकार करना चाहिए कि पंजाब में विविधीकरण के लक्ष्य केवल नैतिक प्रोत्साहन से हासिल नहीं किए जा सकते। निश्चित रूप से इसके लिए अनिवार्य शर्त है कि बाजार की संरचना में जरूरत के अनुरूप बदलाव प्राथमिकता के आधार पर किए जाएं। सही मायनों में सरसों के लिये एमएसपी समर्थित खरीद और स्थानीय प्रसंस्करण, भंडारण और मूल्य शृंखलाओं में निवेश किसानों को सरसों की खेती अपनाने के लिये प्रोत्साहित कर सकता है। यही प्रयास पंजाब के खेतों में पीली आभा फिर से पैदा करने की दिशा में कारगर साबित होंगे। सही मायनों में पंजाब में सरसों की खेती की कहानी नीतिगत विसंगतियों को ही उजागर करती है। दरअसल, संस्थागत स्तर पर समर्थन कुछ चुनिंदा फसलों को दिया जाता रहा है। जब तक यह असंतुलन दूर नहीं किया जाता, सरसों एक खोये हुए अवसर का प्रतीक बनकर रह जाएगी। इस फसल के पुनरुद्धार के लिये महज नारों की ही नहीं, बल्कि उसी गंभीरता की आवश्यकता है, जो गेहूं और धान की फसलों को लेकर लंबे समय से बरती जाती रही है।

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