पिछले दिनों इस खबर ने दिल्ली और देश के लोगों को चौंकाया कि इस साल जनवरी माह में ही देश की राजधानी में 800 लोग लापता पाए गए, जिसमें महिला, बच्चे व अन्य वयस्क भी शामिल हैं। जैसा कि स्वाभाविक था दिल्ली में लापता लोगों का आंकड़ा सामने आने के बाद आम लोगों में चिंता व्याप्त हो गई। प्रशासनिक स्तर पर भी इस समस्या की ओर अधिकारियों का ध्यान गया। बेलगाम सोशल मीडिया पर तो इन आंकड़ों पर अपनी-अपनी सुविधा और राजनीतिक हितों के मद्देनजर व्याख्या और बयानबाजी सामने आने लगी। पब्लिक फोरम पर कहा जाने लगा कि यह दिल्ली की कानून व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह है। इन आंकड़ों के सामने आने के बाद घर से निकलने के बाद सुरक्षा इंतजामों को लेकर तमाम तरह की सलाहें दी जाने लगीं। कुछ लोग देश के सिस्टम पर सवाल खड़े करने लगे। कुछ लोगों में भय से जुड़ी प्रतिक्रिया भी सामने आई। लेकिन इस बाबत दिल्ली पुलिस द्वारा जारी आंकड़े भी अधिक चिंता बढ़ाने वाले नजर आए। प्रथम दृष्टया यह खबर परेशान करने वाली है, लेकिन पड़ताल में पाया गया कि यह स्थिति पिछले कुछ सालों के आंकड़ों के ही अनुरूप है। अगर हम पिछले कुछ सालों के आंकड़ों पर नजर डालें तो यह स्थिति की पुनरावृत्ति ही है। लेकिन यदि बीते कुछ सालों में लापता होने वाले लोगों की संख्या पर नजर डालें तो कहा जाता है कि इस साल जनवरी में सामने आई लापता लोगों की संख्या ज्यादा नहीं है। इस बाबत दिल्ली पुलिस का कहना है कि जनवरी 26 में कुल 1,777 लोगों के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज कराई गई। प्रथम दृष्टया यह संख्या भले ही बढ़ी लगे, लेकिन जब पिछले दो सालों के आंकड़ों से इसकी तुलना की जाती है तो नई तस्वीर उभरती है। दरअसल, इन आंकड़ों की तह में जाएं तो दिल्ली का विशाल इलाका व सघन जनसंख्या घनत्व भी इसके मूल में है।
दरअसल, एक बड़ी आबादी रोजगार व अन्य कार्यों के लिए दिल्ली आती-जाती रहती है। दिल्ली पुलिस के आंकड़ों के अनुसार साल 2024 में करीब 24,893 लोग लापता हुए थे। यानी एक माह में औसतन 2,074 लोग। वहीं साल 2025 में ये संख्या 24,508 लोग लापता हुए। अर्थात् हर माह 2,042 लोग गुम हुए। इस दृष्टि से जनवरी, 26 का आंकड़ा इस संख्या से कम है। सवाल है कि 2026 के पहले माह के आंकड़ों को लेकर भय क्यों व्याप्त हुआ? दरअसल, पहले पंद्रह दिनों के आंकड़ों के हिसाब से दिल्ली में हर रोज 54 लोग लापता हो रहे थे। इन आंकड़ों के सामने आने के बाद लोगों ने इसके मूल में किसी संकट को देखा। दिल्ली पुलिस के अनुसार ये आंकड़े स्थायी गुमशुदगी के नहीं होते। कुछ लोग अल्पकाल के लिए कहीं चले जाते हैं और देर रात तक घर भी लौट आते हैं। पुलिस का यह भी कहना है कि राष्ट्रीय राजधानी में ऑनलाइन और ऐप आधारित सिस्टम के जरिये लोग जल्दबाजी में अपने परिजनों के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज करा देते हैं। मसलन यदि कोई बच्चा किसी कारणवश स्कूल से लौटने में देर कर दे, कोई व्यक्ति कुछ घंटों तक फोन संपर्क से कट जाए या कोई बुजुर्ग भटकने पर देर से घर पहुंचे तो लोग गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा देते हैं। ये कथित गुमशुदा लोग कुछ समय बाद घर तो लौट आते हैं, लेकिन लोग पुलिस डेटा को अपडेट नहीं करते। फलस्वरूप पुलिस आंकड़ों में उनकी गुमशुदगी बनी रहती है। पुलिस का दावा है कि लापता लोगों को खोजने की दर में लगातार सुधार हो रहा है। साल 2016 में जो 23,409 लोग लापता हुए थे, उनमें से करीब 85 फीसदी नौ साल के भीतर मिल गए। साल 2025 में दर्ज मामलों में 63 फीसदी लोगों को भी एक साल के भीतर तलाश लिया गया। दलील है कि कई जटिल मामलों में तलाश का काम एक साल तक पूरा नहीं हो पाता। अन्य राज्यों में उनकी तलाश में समय लगता है। फिर भी पुलिस का दावा है कि दिल्ली के लापता लोगों की संख्या का आंकड़ा दुनिया के कई विकसित देशों से बेहतर स्थिति में है।

