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कचरे का बोझ

नये नियमों का सख्ती से पालन जरूरी

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सुप्रीम कोर्ट की इस गंभीर चिंता से सहमत हुआ जा सकता है कि ठोस कचरे का निस्तारण एक पर्यावरणीय मुद्दा मात्र नहीं है बल्कि यह जन-स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था के लिये भी गंभीर चुनौती है। निस्संदेह, जब हम विकसित भारत के व्यापक लक्ष्य हासिल करने की बात करते हैं तो नागरिक जीवन से जुड़ी बुनियादी सुविधाओं का सही ढंग से क्रियान्वयन भी एक अनिवार्य शर्त है। निस्संदेह, देश में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन एक बड़ी नागरिक चुनौती बनी हुई है। देश के शहरी व ग्रामीण क्षेत्र, कचरे के पहाड़ों से दबे लैंडफिल, अनुचित अपशिष्ट के अलग-अलग न होने तथा कचरे के प्रभावी निपटान की चुनौती से जूझ रहे हैं। ठोस कचरा निस्तारण से जुड़े नये नियम लागू होने से कुछ सप्ताह पूर्व सुप्रीम कोर्ट ने देश में दशकों पुराने ठोस अपशिष्ट उपचार नियमों के अनुपालन में कोताही को लेकर चिंता व्यक्त की है। अदालत का मानना है कि बढ़ते कचरे का बोझ नागरिक जीवन की सुगमता को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर रहा है। वहीं दूसरी ओर अमृत यानी अटल मिशन फॉर रिजुवेनेशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन तथा स्मार्ट सिटीज जैसी प्रमुख योजनाओं के क्रियान्वयन में खामियों को उजागर किया है। यही वजह है कि न्यायालय ने समस्या की गंभीरता को महसूस करते हुए नियमों को सख्ती से लागू करने तथा स्थानीय निकायों के निर्वाचित प्रतिनिधियों की जवाबदेही तय करने की बात कही है। सही मायनों में यह समय की भी जरूरत है।

दरअसल, शीर्ष न्यायालय ने स्थानीय निकायों और निर्वाचित प्रतिनिधियों मसलन पार्षदों व कॉर्पोरेटरों को दायित्व दिया है कि वे क्षेत्र के नागरिकों में स्वच्छता व ठोस कचरे के निस्तारण हेतु जिम्मेदारी की भावना विकसित करने की पहल करें। जनजागरण से ही विकट होती समस्या के निस्तारण में मदद मिल सकती है। इस दिशा में नरमी की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। प्रारंभिक चरण में दायित्व निर्वहन में विफल रहने पर जुर्माना विकल्प हो सकता है। वहीं बार-बार नियमों का उल्लंघन करने कानूनी कार्रवाई अपरिहार्य है। निस्संदेह, ऐसे मामलों में शून्य सहिष्णुता स्वच्छता और ठोस कचरे के निस्तारण में प्रभावी भूमिका निभा सकती है। साथ ही लापरवाह अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई करना कर्तव्य की अनदेखी करने पर कड़ा संदेश दे सकती है। स्थानीय प्रशासन के अधिकारियों तथा नागरिक कल्याण संगठनों के बीच बेहतर तालमेल भी इस दिशा में कारगर भूमिका निभा सकता है। आने वाले समय में भारत के आर्थिक विकास के साथ होने वाली उपभोग की वृद्धि और परिणामस्वरूप अपशिष्ट उत्पादन में वृद्धि होना स्वाभाविक ही है। हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा एक लाख करोड़ रुपये के निवेश से शहरी अवसंरचना में सुधार के लिये की गई पहल, सही दिशा में एक कदम है। हालांकि, यह एक हकीकत है कि नीति-निर्माताओं द्वारा ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को प्राथमिकता दिए बिना भारत के शहर बढ़ती आबादी की मांगों को पूरा करने के लिये संघर्ष करते रहेंगे। ऐसे में ठोस कचरे से मुक्त भारत लक्ष्य महज एक सपना मात्र बनकर रह सकता है। लेकिन इसके बावजूद इस दिशा में सार्थक-सुनियोजित प्रयास दीर्घकाल में सार्थक साबित हो सकता है।

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