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जीवनशैली के रोग

आधी आबादी का गिरफ्त में आना चिंताजनक

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निस्संदेह, राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय यानी एनएसओ की वह रिपोर्ट राष्ट्रीय चिंता बढ़ाने वाली है कि देश की पचास फीसदी आबादी जीवनशैली से जुड़े रोगों से ग्रस्त-त्रस्त है। यह भी फिक्र बढ़ाने वाला है कि एक दशक पहले देश में खान-पान, जीवन व्यवहार व तनाव से उपजे रोगों का प्रतिशत जहां 31 था, वो अब पचास फीसदी तक जा पहुंचा है। वहीं एक अच्छी बात यह है कि चिकित्सा सुविधाओं के विस्तार व नये शोध अनुसंधान के चलते संक्रामक रोगों का प्रतिशत घटा है। लेकिन हमारे खानपान व जीवन व्यवहार में तेजी से आ रहे बदलावों के चलते लोग मोटापे, मधुमेह, तनाव व उच्च रक्तचाप जैसे रोगों के शिकार हो रहे हैं, जिसके चलते जानलेवा संकट भी बढ़ रहा है। हमें स्वीकार करना होगा कि आजादी के बाद देश में आम आदमी के जीवन स्तर में किसी न किसी तरह सकारात्मक बदलाव आया है, जिसके चलते जीवनशैली भी बदली है। लेकिन पौष्टिक व शरीर की जरूरतों के अनुकूल भोजन न करने, शारीरिक निष्क्रियता, स्क्रीन टाइम बढ़ने से नींद की कमी आदि अनेक ऐसे कारण हैं जो इन रोगों के वाहक बनते हैं। इसमें आनुवंशिक रोगों की भी भूमिका है। धीरे-धीरे शरीर को खोखला करने वाले ये रोग कालांतर जानलेवा बन जाते हैं। अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन भी चिंता जता रहे हैं कि भारत में विभिन्न रोगों से मरने वाले ज्यादातर लोगों की मौत की वजह संक्रामक रोग के बजाय जीवनशैली से जुड़े रोग हैं। जो हमारी गभीर चिंता का विषय होना चाहिए। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि चिकित्सा विज्ञान की आशातीत प्रगति के चलते आम भारतीय की जीवन प्रत्याशा में इजाफा हुआ है, लेकिन जीवनशैली से जुड़े रोगों का बढ़ना इस कामयाबी पर पानी फेरने जैसा है। यही वजह है कि देश में स्वास्थ्य बीमा कारोबार में तेजी आई है, यह तेजी ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक है। लेकिन ये बीमा कंपनियां रोग से बचाव में मदद करने के बजाय व्यक्ति के रोगों के इलाज को प्राथमिकता देती हैं।

हालांकि, देश में जीवनशैली से जुड़े रोगों से बचाव के लिये जागरूकता जरूर आई है। जिसके लिये राजग सरकार को श्रेय देना होगा। प्रधानमंत्री के प्रयासों से योग का दुनिया में व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ है। यह जागरूकता भारत में भी है। लेकिन बड़ी आबादी अब भी इससे दूर है। प्रधानमंत्री ‘मन की बात’ रेडियो कार्यक्रम व अन्य मंचों से मोटापे से बचाव और खानपान में मिलेट अपनाने पर अक्सर बल देते नजर आते हैं। लेकिन इस पर सकारात्मक प्रतिसाद अपेक्षित अनुपात में नहीं मिल पाया है। यही वजह है कि लोगों को महंगा इलाज कराने को बाध्य होना पड़ता है। विडंबना है कि उच्च रक्तचाप, मधुमेह जैसे रोगों से राहत के लिये डॉक्टर जीवनभर दवा खाने को कहते हैं। तमाम लोग निजी अस्पतालों में हृदयरोग आदि के महंगे इलाज से गरीबी की दलदल में फंस जाते हैं। कोरोना संकट के सबक हमें याद रखने चाहिए, जब लोगों ने जेवर, जमीन व मकान तक गिरवी रखकर अपना उपचार कराया। लेकिन यदि लोग शारीरिक सक्रियता बढ़ाएं, योग, ध्यान और व्यायाम को जीवन का हिस्सा बनाएं तो इन रोगों से बच सकते हैं। विडंबना यह है कि हमने परंपरागत भारतीय खाद्य पदार्थों की अनदेखी करके पश्चिमी व चीनी खाद्य विकल्पों को चुनना शुरू कर दिया है। जो हमारी जलवायु व शारीरिक प्रकृति के अनुरूप नहीं हैं। जंक फूड में रासायनिक पदार्थ नुकसानदायक हैं वहीं तले-भुने खाने ने मोटापे को बढ़ाया है। फिर हम शारीरिक श्रम करने से बचते हैं और आरामतलबी का जीवन जीते हैं। जिसके फलस्वरूप बढ़ा मोटापा कई रोगों का वाहक बन जाता है। देर रात तक मोबाइल व इंटरनेट पर सोशल मीडिया में सक्रिय रहने से हमारी नींद में खलल पड़ा है। नींद पूरी न होने से तनाव व अवसाद बढ़ा है। हमारा देर से भोजन करना, देर से सोना और सुबह देर से उठना भी रोगों का कारक बना है। हमने जबसे खाने में पारंपरिक पौष्टिकता के बजाय स्वाद को प्राथमिकता देनी शुरू की है, तभी से शरीर में जरूरी विटामिनों की कमी बढ़ी है। प्रदूषित खान-पान की भी इस संकट में भूमिका है। वहीं सहज-सरल व्यवहार हमारे स्वस्थ होने की गारंटी है।

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