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जीवन-रक्षक न्यायिक पहल

हटाएं सड़क किनारे पड़ी दुर्घटनाग्रस्त गाड़ियां

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कैसी विडंबना है कि जिस जिम्मेदार व्यवहार को शासन-प्रशासन को अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए करना चाहिए, उसकी पहल अदालत को करनी पड़ रही है। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक जरूरी नागरिक समस्या की ओर शासन-प्रशासन का ध्यान दिलाया है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है- सड़कों के किनारे छोड़े गए दुर्घटनाग्रस्त वाहन। जिनसे दुर्घटना की आशंका बनी रहती है। दरअसल, शिमला एयरपोर्ट तक जाने वाली सड़क और जिला अदालत के आस-पास पड़ी अनेक दुर्घटनाग्रस्त गाड़ियों को देखकर ही अदालत ने यह बात कही। कोर्ट का कहना है कि ये दुर्घटनाग्रस्त गाड़ियां सड़क सुरक्षा के लिये खतरा और पर्यावरण के लिये नुकसानदेह हैं। निस्संदेह,यह प्रशासनिक लापरवाही का जीता-जागता उदाहरण है। पहाड़ी राज्यों में, जहां सड़कें संकरी और घुमावदार होती हैं और लगातार भूस्खलन का खतरा बना रहता है, वहां सड़क की हर इंच जगह कीमती होती है। तार्किक ही है कि छोड़ी गई गाड़ियां सड़क की चौड़ाई को कम कर देती हैं। वहीं दूसरी ओर तीव्र मोड़ों पर देखने में बाधा डालती हैं। ये आपातकालीन सेवाओं की आवाजाही में भी बाधक बनती हैं। निस्संदेह, इससे दुर्घटना की आशंका बढ़ जाती है। विशेष रूप से बरसात के मौसम में जब फिसलन भरी सड़कों और कम दृश्यता के कारण वाहन चालक पहले ही ड्राइविंग में मुश्किलों का सामना कर रहे होते हैं। ऐसे में सड़कों को कबाड़खाने में तब्दील करने की इजाजत किसी भी कीमत पर नहीं दी जा सकती।

दूसरी तरफ इन दुर्घटनाग्रस्त वाहनों के पर्यावरण पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव की भी अनदेखी नहीं की जा सकती। इनका पर्यावरण पर पड़ने वाला प्रभाव भी एक गंभीर समस्या है। क्षतिग्रस्त वाहनों से अक्सर ईंधन, इंजन ऑयल,कूलेंट, ब्रेक फ्लूइड तथा बैटरी एसिड रिसता रहता है। जिससे मिट्टी तथा जल-स्रोत प्रदूषित हो सकते हैं। हिमालय पर्वत शृंखलाओं जैसे पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों में इस तरह के प्रदूषण के दूरगामी घातक प्रभाव हो सकते हैं। निश्चित रूप से पुलिस, परिवहन विभाग, नगर निकायों, बीमा कंपनियों और न्यायपालिका के बीच तालमेल न होने के कारण ही समस्या जटिल बनी हुई है। दुर्घटनाग्रस्त वाहनों के संबंध में जांच लंबित होने, बीमा संबंधी विवादों और दुर्घटनाग्रस्त वाहनों के लिये निर्धारित जगह न होने से यह समस्या जटिल बनी हुई है। इन सभी कारणों से ये दुर्घटनाग्रस्त वाहन सड़कों के किनारे यूं ही पड़े रहते हैं। यही वजह है कि हाईकोर्ट ने समस्या के निदान के लिये एक कारगर एक्शन प्लान की मांग की है। जिसमें जब्त वाहनों के लिये खास यार्ड बनाने, डिजिटल तरीके से पड़ताल, जब्त वाहनों को छोड़ने के लिये समयबद्ध प्रक्रिया और स्क्रैपिंग सेंटरों के जरिये वैज्ञानिक तरीके से रीसाइक्लिंग की सख्त जरूरत है। देश की शीर्ष अदालत ने भी बार-बार कहा है कि जब्त गाड़ियों को अनिश्चित समय के लिये सड़कों पर सड़ने के लिये नहीं छोड़ा जा सकता। सड़क सुरक्षा के मायने सिर्फ ट्रैफिक नियमों को लागू करवाना या संरचना को बेहतर बनाना ही नहीं है। वास्तव में लोगों की जान बचाने के लिये दुर्घटनाग्रस्त वाहनों को सार्वजनिक स्थानों से हटाना भी एक बुनियादी प्रशासनिक जिम्मेदारी है।

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