अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने भी कहा है कि नई पीढ़ी को सुना जाना चाहिए। विरोध प्रदर्शन संवाद का एक वैध तरीका है। हाल ही में जेन-जी आंदोलन के प्रदर्शन के दौरान जो शिकायतें सामने आई हैं, वे जायज हैं। गुरुवार को जेन-जी से जुड़े एक कार्यक्रम में बातचीत के दौरान भागवत ने ये बातें कहीं। उन्होंने यह भी कहा कि विरोध करने वाले राष्ट्रविरोधी नहीं हैं। लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन भी सहमति बनाने का माध्यम है। हालांकि, विपक्ष ने तंज किया कि उन्हें यह सलाह सरकार को भी देनी चाहिए और यह भी कि आंदोलनकारियों की मांग को इतनी देर से क्यों सुना गया। बहरहाल, भागवत ने माना कि बहुत संभव है कि विरोध के दौरान मुद्दों को लेकर विचारों की भिन्नता हो, लेकिन चर्चा के बाद ही किसी विषय पर सहमति बनती है। साथ ही माना कि आंदोलन का उद्देश्य सहमति बनाना होना चाहिए, न कि समाज में विभाजन पैदा करना। उन्होंने माना कि भारत की शिक्षा व्यवस्था में बहुत कुछ बदलाव की जरूरत है, जो अभी तक नहीं हो पाया है। यही वजह है कि छात्रों का गुस्सा सामने आ रहा है, जिसे संवाद से दूर करने की जरूरत है। साथ ही, सख्ती नहीं, बातचीत के जरिये अपनापन का अहसास कराना भी जरूरी है। यह भी कि जेन-जी और जेन-अल्फा की सोच पहले की पीढ़ियों से भिन्न है। पहले की पीढ़ी बड़ों की बात मान लेती थी, सवाल नहीं करती थी। लेकिन नई पीढ़ी सवाल करने के साथ ही तर्कसंगत जवाब की आकांक्षा रखती है। निस्संदेह, बहस से कई विचार सामने आते हैं। हर व्यक्ति का अलग दृष्टिकोण होता है। लेकिन इसका सकारात्मक पक्ष यह है कि एक ही विषय के कई पहलू सामने आ सकते हैं। यह तय है कि विचार-प्रतिविचार के मंथन से नई दिशा व नई तस्वीर उभरती है। विरोध करना बुरा नहीं है, लेकिन उसका स्वरूप लोकतांत्रिक होना चाहिए।
भागवत ने इस बात पर भी बल दिया कि विरोध-आंदोलन संविधान की मर्यादा के दायरे में होना भी जरूरी है। समस्याओं पर ध्यान दिया जाना चाहिए, लेकिन उसका लक्ष्य व्यक्ति का विरोध नहीं, बल्कि व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव होना चाहिए। साथ ही, संघ प्रमुख ने आरक्षण पर भी राय स्पष्ट की कि सामाजिक भेदभाव दूर करने तक आरक्षण की जरूरत होगी। लेकिन सवाल यह है कि इस सत्य से वाकिफ होने के बावजूद सरकारें क्यों टालमटोल का रवैया अपनाती हैं? यह संवादहीनता की स्थिति क्यों पैदा की जाती है? विडंबना यह है कि सरकारें तब जागती हैं जब स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाती है। सरकारों को लोकतंत्र में प्रतिरोध के स्वरों का भी सम्मान करना है। लोकतंत्र का आधार जनमत है। जनमत को सुना जाना चाहिए। आमतौर पर नागरिक तब ही सड़कों पर उतरते हैं जब पानी सिर के ऊपर से गुजरने लगता है। ऐसे में, शांतिपूर्ण प्रदर्शन और असहमति के स्वरों पर ध्यान देने की जरूरत है। आज जरूरत इस बात की है कि पुलिस को बताया जाए कि राष्ट्रविरोधियों और जायज मांगों के लिए आंदोलन कर रहे लोगों को एक ही लाठी से नहीं हांका जा सकता। खासकर, जेन-जी पर शक्ति प्रयोग असंतोष को उग्र बनाना ही है। सत्ताधीशों को इस बात का भान होना चाहिए कि असहमति और शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति से लोकतंत्र जीवंत होता है। सत्ता की उदासीनता और उपेक्षापूर्ण रवैये से आंदोलन की जमीन तैयार होती है। कालांतर में हठधर्मिता से यह आक्रोश को ही बढ़ाता है। सत्ताधीशों को समझना चाहिए कि लोकतंत्र में लोग अपनी बात सुनाने के लिए आंदोलन को विकल्प के तौर पर अपनाते हैं। ऐसे ही नीट प्रश्नपत्र मुद्दे पर समय रहते वे कदम पहले ही उठा लिए जाते, तो आंदोलन को व्यापक होने से टाला जा सकता था। अक्सर संवादहीनता की स्थिति में आंदोलन में राजनीतिक दल रोटियां सेंकने लगते हैं। निहित स्वार्थी तत्व इसमें अवसर तलाशने लगते हैं, जिससे आंदोलन की दिशा नियंत्रित नहीं रह सकती है। यही वजह है कि एक सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि युवाओं के गुस्से को शांत करने के लिए बातचीत जरूरी विकल्प है। निश्चित ही, पुलिस को भी संवेदनशील बनाने की जरूरत है। आशा है, भागवत की सलाह पर सरकारें ध्यान देंगी।

