नौकरी ही नौकरी

मगर दूरगामी प्रभावों का हो अध्ययन

नौकरी ही नौकरी

ऐसे वक्त में जब देश कोरोना संकट से उपजी बेरोजगारी और रूस-यूक्रेन युद्ध से बाधित विश्व आपूर्ति शृंखला से उपजी महंगाई की त्रासदी से जूझ रहा है, केंद्र सरकार द्वारा बेरोजगारों के लिये नौकरियों का पिटारा खोलना सुकून देने वाला है। शायद यह पहली बार है कि एक साथ 10 लाख सरकारी नौकरियों की भर्ती करने की घोषणा हुई हो। साथ ही सेना के तीनों अंगों में ‘अग्निपथ योजना’ के तहत 46 हजार ‘अग्निवीरों’ की भर्ती की घोषणा सेनाओं में भविष्य तलाशने वाले युवाओं की उम्मीदों को पंख लगाने जैसा ही है। हालांकि, इस योजना के व्यावहारिक व दूरगामी पहलुओं को लेकर विमर्श जारी है। यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि कोरोना संकट से बेरोजगारी में अप्रत्याशित उफान आया। देशव्यापी सख्त लॉकडाउन ने इस संकट में इजाफा किया। बड़े पैमाने पर लोगों की नौकरी गई तो कई लोगों को कम वेतन पर काम करना पड़ा। यहां तक कि वर्ष 2020 की दूसरी तिमाही में बेरोजगारी दर 23.5 तक जा पहुंची थी। वहीं इससे पहले वर्ष 2016 में नोटबंदी के चलते भी बेरोजगारी में इजाफा हुआ था। ऐसे में डेढ़ साल में दस लाख नौकरियों की घोषणा बड़ा राहतकारी फैसला है। हालांकि, इस घोषणा के राजनीतिक निहितार्थों से इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि इस साल कुछ महत्वपूर्ण राज्यों में चुनाव होने हैं। वहीं जब तक दस लाख भर्तियों की डेढ़ साल की प्रक्रिया पूरी होगी, तब तक 2024 के महासमर की दुंदुभी बज चुकी होगी। बहरहाल, इसके बावजूद देश में दुनिया की सबसे तेज अर्थ व्यवस्था के दावे के बावजूद रोजगार के अवसरों का सृजन न हो पाना विकास के माॅडल पर सवालिया निशान लगा रहा था। ऐसे में इस घोषणा को सुखद ही कहा जायेगा कि दिसंबर 2023 तक भर्तियों का काम पूरा कर लिया जायेगा। जरूरत इस बात की है कि चयन की प्रक्रिया पारदर्शी हो और किसी तरह की अनियमितताओं की गुंजाइश न रहे। यही सरकार की घोषणा की सार्थकता को सिद्ध करेगा।

दरअसल, पिछले दिनों संसद में बताया गया था कि केंद्र सरकार के अधीन चालीस लाख स्वीकृत पदों में से 8.72 लाख पद खाली हैं। यदि इसमें राज्यों के आंकड़ों को भी जोड़ लिया जाये तो संख्या बड़ी हो सकती है। निस्संदेह, आज भी देश के युवाओं की पहली प्राथमिकता सरकारी नौकरी ही होती है, उनके लिये तो यह सुनहरा अवसर जैसा ही है। दरअसल, देश में केंद्र सरकार के अधीन आने वाले पांच बड़े विभागों रक्षा, गृह, डाक, रेलवे व राजस्व डिपार्टमेंट में ही कुल 92 फीसदी नौकरियां उपलब्ध होती हैं। लेकिन ऐसे वक्त में जब बढ़ती आबादी के साथ विश्व की प्रगति के साथ कदम से कदम मिलाना जरूरी है तो हमें निजी क्षेत्र में भी रोजगार के बड़े अवसर सृजित करने होंगे। निस्संदेह सरकारी नौकरियों की एक सीमा होती है। उसकी उत्पादकता के प्रश्न पर भी मंथन जरूरी है। सरकार को ऐसी नीतियां बनानी चाहिए, जिससे निजी क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़ें। निस्संदेह, युवाओं के देश में बेरोजगारी संकट एक गंभीर चुनौती थी। तभी विभिन्न विभागों,मंत्रालयों में मानव संसाधनों की स्थिति की समीक्षा के बाद ही दस लाख नौकरियों की घोषणा की गई है। अब जरूरत इस बात की है कि भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी न हो,यह सरकार की साख के लिये भी जरूरी है। विगत में तमाम भर्ती परीक्षाओं में पेपर आउट होने के मामले उजागर हुए हैं। साथ ही सरकारी नौकरियों में जवाबदेही तय करने की भी जरूरत है क्योंकि इस नौकरी के साथ आरामतलबी का मिथ चस्पां है। इसके साथ जरूरी है कि राज्यों में भी ऐसे अभियान बेरोजगारी संकट को दूर करने के लिये चलाये जाएं। खासतौर पर आवश्यक सेवाओं मसलन चिकित्सा,शिक्षा व पुलिस जैसे विभागों में रिक्त पदों को भरने को प्राथमिकता दी जाये। वहीं अग्निपथ योजना के तहत होने वाली सेना की अस्थाई नियुक्तियों का स्वागत होना चाहिए। इससे होने वाली बचत से सेना के आधुनिकीकरण के लक्ष्य हेतु संसाधन उपलब्ध हो पायेंगे। लेकिन इसके बावजूद कोशिश हो कि सेना के लिये प्रशिक्षण, अनुशासन, समर्पण व युद्धक क्षमता की गुणवत्ता में गिरावट न आये।

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