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अपराध की मंशा

यौन हिंसा पर सुप्रीम कोर्ट की संवेदनशील व्याख्या

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सुप्रीम कोर्ट द्वारा इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले को रद्द करना, जिसमें ‘बलात्कार के प्रयास’ की परिभाषा बदल दी गई थी, केवल एक कानूनी सुधार मात्र नहीं है, बल्कि उससे कहीं अधिक है। यह न्यायिक संवेदनशीलता और गंभीर मामलों मे न्यायिक दृष्टि की स्पष्टता की पुन: पुष्टि भी है। सर्वोच्च अदालत ने पॉक्सो एक्ट के साथ ही धारा 376 आईपीसी के तहत आरोप बहाल करके, इस बात पर भी बल दिया कि अपराध के इरादे को, प्रत्यक्ष कृत्य के साथ कमतर नहीं माना जा सकता है। दरअसल, हाईकोर्ट ने इस बाबत जो टिप्पणी की थी, उसको लेकर तल्ख प्रतिक्रियाएं सामने आई थीं, जिसे किसी सभ्य समाज की मान्यताओं के प्रतिकूल माना गया था। दरअसल, हाई कोर्ट ने माना था कि एक नाबालिग के उरोज पकड़ना, उसके पायजामे की डोरी ढीली करना और उसे घसीटकर ले जाने का प्रयास दुराचार की तैयारी थी, न कि बलात्कार का प्रयास, क्योंकि इसमें अपराध की दिशा में कोई सीधा कदम नहीं उठाया गया था। स्वाभाविक रूप से इस तरह की संकीर्ण व्याख्या के खिलाफ समाज में प्रतिक्रिया होनी ही थी। कहीं न कहीं इस तंग व्याख्या से अपराधी के जघन्य इरादे और प्रयास की अवधारणा को कमजोर करने का जोखिम भी था। निस्संदेह, इस तरह की व्याख्या से महिलाओं का उत्पीड़न करने वाले अपराधी तत्वों के हौसले बुलंद ही होते। जाहिर है इस तरह की सोच कोई सभ्य समाज बर्दाश्त नहीं कर सकता है। यह सुखद ही है कि सर्वोच्च न्यायालय ने इस संकीर्ण व्याख्या वाले मामले में स्वत: संज्ञान लेते हुए सार्थक हस्तक्षेप किया है। दरअसल, आपराधिक कानून में, प्रयास तब माना जाता है, जब किसी अपराध की तैयारी उस कृत्य को अंजाम देने में बदल जाती है। जो कि इच्छित अपराध के निकट होती है। इस मामले में आरोप- शारीरिक छेड़छाड़, निर्वस्त्र करने और जबरन घसीटना, यदि सिद्ध हो जाते हैं, तो स्पष्ट रूप से यौन उत्पीड़न की ओर एक सुनियोजित कदम की पुष्टि कर देते हैं। जिसे केवल पीड़िता के करुण क्रंदन सुनने वाले प्रत्यक्षदर्शियों के हस्तक्षेप से ही रोका गया।

निस्संदेह, इसके विपरीत मानना यौन हिंसा की वास्तविकताओं और नाबालिगों की असुरक्षा को अनदेखा करना ही होगा। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप में एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि यह फैसला आरोपों की गंभीरता की पुष्टि करता है। ताकि पूर्व सुनवाई में साक्ष्यों की उचित संदर्भ में जांच की जा सके। ऐसे वक्त में जब देश की कई अदालतों के लैंगिक न्याय के प्रति दृष्टिकोण की कड़ी आलोचना हो रही थी, यह निर्णय इस बात की पुष्टि करता है कि कानूनी तर्क को संवैधानिक मूल्यों को बनाये भी रखना चाहिए। निर्विवाद रूप से, जिनका उद्देश्य किसी सभ्य समाज में नागरिकों को आसन्न खतरे से भी बचाना ही होता है। बहरहाल, इस प्रकरण में यह सार्थक हस्तक्षेप इस बात की पुष्टि भी करता है कि कानून बच्चों को न केवल अपराधियों द्वारा अंजाम दिए जा चुके अपराधों से बल्कि भविष्य में आसन्न अपराधों से भी बचाता है। इस प्रकरण के बाद कहा जा सकता है कि देश के सर्वोच्च न्यायालय ने न केवल न्यायिक जवाबदेही में संतुलन स्थापित किया, बल्कि आखिरकार आम लोगों के विश्वास को भी बहाल किया है। निश्चित रूप से न्यायिक प्रक्रिया को न्याय के नैसर्गिक नियमों के अनुरूप ही व्यवहार करना चाहिए। जो देश की न्यायिक व्यवस्था के प्रति आम आदमी के भरोसे को बढ़ाने वाला भी होगा। यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि जब व्यक्ति समाज में चारों तरफ से व सिस्टम से निराश हो जाता है तो न्याय की चौखट उसकी उम्मीद की अंतिम किरण होती है। यदि वहां से भी संवेदनशील पहल होती न नजर आए तो उसका निराश होना स्वाभाविक ही है। सुप्रीम कोर्ट की इस संवेदनशील पहल ने सही मायने में उस आदमी के भरोसे को ही संबल दिया है। जिसका स्वागत किया जाना जरूरी भी है।

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