यह बात परेशान करने वाली है कि जिस इंटेंसिव केयर यूनिट में बेहद गंभीर मरीजों को जीवन बचाने के लिये रखा जाता है, रिपोर्ट बता रही हैं कि वहां संक्रमण का खतरा सबसे अधिक हो सकता है। ऐसे में इंटेंसिव केयर यूनिट यानी आईसीयू में भर्ती गंभीर अवस्था में, कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले मरीजों के जीवन का क्या कुछ हो सकता है, उसकी कल्पना सहज की जा सकती है। हालांकि, अब तक तो कुछ विदेशी विशेषज्ञों ने भारतीय अस्पतालों में आईसीयू की स्थिति को लेकर सवाल उठाये थे, खासकर ब्रिटेन के बहुचर्चित मेडिकल जर्नल ‘द लैंसेट ग्लोबल हेल्थ’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट में भारतीय इंटेंसिव केयर यूनिट में महज रक्त संक्रमण से संबंधित आंकड़ों का उल्लेख था। लेकिन अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के माइक्रोबायोलॉजी एवं इंफेक्शन नियंत्रण विभाग द्वारा किए गए हालिया अध्ययन के निष्कर्ष गंभीर चिंता बढ़ाने वाले हैं। दरअसल, एम्स का यह ताजा अध्ययन बताता है कि जिस आईसीयू में गंभीर हालात में पहुंचे मरीजों को जीवन बचाने वाले उपचार देने के लिये भेजा जाता है, वहीं संक्रमण का सबसे ज्यादा खतरा रहता है। चिंता इसलिए भी अधिक है क्योंकि एम्स का यह अध्ययन व्यापक स्तर पर किया गया था। इसमें देश के चौंतीस राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के एक सौ नब्बे से अधिक आईसीयू को शामिल किया गया था। अध्ययन ने बताया है कि इन इंटेंसिव केयर यूनिटों में संक्रमण का सर्वाधिक खतरा होता है। खासकर कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले रोगियों के लिये यह स्थिति चुनौतीपूर्ण होती है। उन्हें लंबे समय तक जीवन रक्षा के लिये यहां भर्ती रहना पड़ता है। वहीं इन मरीजों की आधुनिक उपकरणों पर अधिक निर्भरता, इस संकट को बढ़ा सकती है। दरअसल, इस व्यापक अध्ययन में कहा गया है कि ऑपरेशन के बाद होने वाले संक्रमणों में रक्त,फेफड़ों तथा मूत्र मार्ग का संक्रमण शामिल है। जिन मरीजों की बीमारी से लड़ने की क्षमता कम होती है, उनके लिये तो यह स्थिति अधिक खतरनाक बन सकती है। जिसके लिए अतिरिक्त सावधानी की जरूरत होती है।
निश्चित रूप से भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान का यह सर्वेक्षण इंटेंसिव केयर यूनिट की संवेदनशील स्थिति को लेकर आंख खोलने वाला है। अध्ययन बेहद सजग होकर निगरानी की जरूरत बताता है। दरअसल, गंभीर रोगों से जूझ रहे मरीज अक्सर आईसीयू में लंबे समय तक भर्ती रहते हैं। इस दौरान वे लगातार जीवन रक्षक उपकरणों पर ही निर्भर रहते हैं। अलग-अलग रोगों के रोगियों द्वारा इनके प्रयोग से संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। असल में, आमतौर पर रोगी को कृत्रिम रूप से ऑक्सीजन देने के लिए वेंटिलेटर, यूरिन पास करने के लिये कैथेटर आदि उपकरणों का उपयोग किया जाता है। ये उपकरण तब संक्रमण की दृष्टि से बेहद संवेदनशील हो जाते हैं। वैसे तो अनेक रोगों की आशंका बनी रहती है लेकिन इंटेंसिव केयर यूनिट में वेंटिलेटर से होने वाला निमोनिया जरा सी लापरवाही से जानलेवा साबित हो सकता है। इतना ही नहीं, लापरवाही व सजगता के अभाव में कई ऐसे बैक्टीरिया भी पनपते हैं, जिन पर एंटीबायोटिक दवाएं भी प्रभावी नहीं होती हैं। एम्स का अध्ययन मानता है कि इंटेंसिव केयर यूनिट में मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट बैक्टीरिया बेहद घातक साबित हो सकता है। इस संकट की कीमत तमाम मरीजों को चुकानी पड़ सकती है। जिसके लिये मरीजों को लंबे समय तक आईसीयू में भर्ती रहना पड़ सकता है, जिसकी उनके तिमारदारों को बड़ी आर्थिक कीमत भी चुकानी पड़ सकती है। यह संक्रमण अतिरिक्त सावधानी के अभाव में जानलेवा भी साबित हो सकता है। अध्ययन से जुड़े विशेषज्ञों की सलाह है कि चिकित्सक व अन्य सहयोगी कर्मचारी हाथ की व अन्य सफाई पर विशेष ध्यान दें। इसके अलावा जीवन रक्षक उपकरणों को जीवाणु व बैक्टीरिया आदि से मुक्त रखने के लिये नियमित विशेष प्रयास किए जाएं। साथ ही एंटीबायोटिक दवाओं का संयमित उपयोग हो। वहीं इंटेंसिव केयर यूनिट में मरीजों की संवेदनशील ढंग से निरंतर जांच-पड़ताल की जानी चाहिए। इसमें जहां चिकित्सा बिरादरी से अधिक सजगता व सतर्कता की उम्मीद है, वहीं इंटेंसिव केयर यूनिट में भर्ती मरीजों के तिमारदारों को को भी सजग व सतर्क रहने की जरूरत है।

