अक्सर ऐसी खबरें सामने आती रहती हैं कि देश के किसी भाग में किसी निजी अस्पताल के आईसीयू में भर्ती मरीज के ठीक होने या ठीक होने की संभावना के बावजूद उसे डिस्चार्ज नहीं किया जाता है। वजह होती है कि अस्पताल का अनवरत गति से चलने वाला कमाई का मीटर। निस्संदेह, आधुनिक चिकित्सा खर्चीली हो गई और बेहतर सुविधाओं के लिए बड़ी रकम चुकानी होती है। लेकिन इस व्यवस्था का मानवीय व संवेदनशील होना अपरिहार्य है। इसके नियमन का कार्य यूं तो देश के नीति-नियंताओं और शासन-प्रशासन को करना चाहिए था। लेकिन विडंबना यह है कि अदालत को ऐसे मामलों में पहल करनी पड़ती है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एक समान गहन चिकित्सा ईकाई दिशानिर्देशों की जरूरत बताना विसंगतियों से जूझती आईसीयू प्रणाली के लिए एक आशा की किरण लेकर आई है। इन दिशानिर्देशों में यह निर्दिष्ट किया गया है कि चिकित्सकीय रूप से स्थिर हो चुके या जिन मरीजों के अंगों को बाहरी सहायता अथवा शारीरिक निगरानी की आवश्यकता नहीं होती, उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी जानी चाहिए। उन्हें अन्य सामान्य वार्डों में स्थानांतरित किया जा सकता है। निश्चित रूप से न्यायालय के ये निर्देश चिकित्सकीय और नैतिक दोनों ही हैं। जो बताते हैं कि जरूरी न होने के बावजूद मरीज को लंबे समय तक आईसीयू में रखना अनुचित है। यह एक हकीकत है कि मानकीकृत आईसीयू प्रोटोकॉल के अभाव में एक अस्पष्ट स्थिति पैदा हो जाती है, जिसकी वजह से मरीज से जुड़े निर्णय असमंजस का शिकार होकर रह जाते हैं। वास्तव में आईसीयू में भर्ती मरीजों के तिमारदारों को चिकित्सा प्रक्रिया की गहन जानकारी अक्सर नहीं होती है। वे केवल चिकित्सक के दिशा-निर्देशों पर ही निर्भर होकर रह जाते हैं। यही वजह है कि अस्पताल प्रबंधन के रहमो-करम पर मरीज को महंगे आईसीयू में लंबे समय तक भर्ती रहने को मजबूर होना पड़ता है। कई बार ऐसा भी होता है कि गहन चिकित्सा कक्ष में भर्ती रहने के बावजूद मरीज को उपचारीय लाभ नहीं मिल रहा होता है।
सही मायनों में सुप्रीम कोर्ट के ये दिशानिर्देश एक सरल व सामान्य सिद्धांत की पुष्टि करते हुए इस विसंगति को दूर करने का प्रयास करते हैं कि किसी भी अस्पताल का आईसीयू मरीज की अनिश्चितकालीन देखभाल के लिए नहीं होता है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि शीर्ष अदालत ने समस्या के यथाशीघ्र समाधान की जरूरत पर बल दिया है। अदालत ने डॉक्टरों की प्रतिष्ठा को संरक्षित करते हुए चिकित्सा संस्थानों व अस्पतालों की जवाबदेही सुनिश्चित करने पर बल दिया है। इस दिशा में व्यवस्थागत मुद्दों पर जोर दिया गया है, जिसमें नर्स व मरीज के अनुपात, विशेषज्ञ पर्यवेक्षण, मानक बुनियादी ढांचा और प्रशिक्षण पर ध्यान केंद्रित कराना एक सराहनीय पहल कही जाएगी। निश्चित रूप से भारत जैसे देश में जहां स्वास्थ्य सेवा की गुणवत्ता में भारी असमानता है, ये न्यूनतम मानदंड अधिक न्यायसंगत देखभाल के लिए आधार बन सकते हैं। सही मायनों में राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान करने और समयबद्ध कार्य योजना तैयार करनी चाहिए। साथ ही निर्देश नीति के क्रियान्वयन हेतु तत्परता दिखानी चाहिए। लेकिन विगत के अनुभव बताते हैं कि एक अच्छे इरादे वाली कार्ययोजना तब अपने लक्ष्य पाने में विफल हो जाती हैं जब उसका क्रियान्वयन आधे-अधूरे ढंग से किया जाता रहा है। निश्चित रूप से निगरानी ढांचे और समन्वित राष्ट्रीय स्तर की कार्रवाई पर अदालत की पहल सही दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन इसकी अनुपालन की सफलता राजनीतिक इच्छाशक्ति, वित्त पोषण और प्रशासनिक क्षमता पर निर्भर करेगी। साथ ही दक्षता के अलावा, मानवीय पहलू को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। गहन चिकित्सा कक्ष में लंबे समय तक भर्ती रहना मरीजों और उनके परिवारों के लिए बेहद कष्टदायक होता है। स्थिर मरीजों को कम स्तर पर देखभाल की जरूरत वाले वार्डों में स्थानांतरित किए जाने से न केवल अनावश्यक चिकित्सा खर्च बचता है। बल्कि यह मानवीय दृष्टिकोण का भी परिचायक है। निश्चित रूप से आईसीयू के लिए एकसमान मानदंड लागू करने का प्रयास भारत की स्वास्थ्य प्रणाली में पारदर्शिता लाने और तर्कसंगत निर्णय लेने को बढ़ावा देने वाला साबित हो सकता है।

