कोई भी अस्पताल बीमार व अशक्त लोगों के जीवन की अंतिम किरण होती है। एक विश्वास का प्रतीक कि वहां से स्वस्थ होकर लौटेंगे। तरह-तरह के रोगों से पीड़ितों का अस्पताल पर भरोसा होता है कि वहां पहुंचकर उनका जीवन सुरक्षित हो जाएगा। लेकिन यदि किसी अस्पताल में उपचार के लिये गई महिला के साथ जांच के नाम पर दुराचार हो और वीभत्स कृत्य उसे मौत के मुंह में धकेल दे तो इससे ज्यादा व भयावह कुछ नहीं हो सकता। यह घटना लाखों मजबूर-बीमार लोगों तथा महिलाओं के भरोसे को तोड़ती है, जब यह पता चलता है कि वीभत्स घटना एक सरकारी अस्पताल में हुई है। हरियाणा के पानीपत स्थित अस्पताल के सीटी स्कैन रूम में एक 58 साल की महिला के साथ हुए दुराचार और उसके बाद रोहतक के पीजीआईएमएस में उपचार के दौरान उसकी मौत ने लाखों लोगों के भरोसे को भी तोड़ा है। निस्संदेह, कानून अपना काम करेगा, पुलिस की जांच अपराधी को सख्त दंड दिलाने में मददगार होगी, लेकिन इस घटना ने संस्थागत सुरक्षा इंतजामों की चिंताजनक नाकामी को एक बार फिर से उजागर कर दिया है। सबसे अधिक विचलित करने वाली बात यह है कि आरोपी पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के तरह अस्पताल की सीटी स्कैन और एमआरआई यूनिट चलाने वाली एक प्राइवेट कंपनी में सिक्योरिटी गार्ड के तौर पर काम करता था। लेकिन सवाल यह उठता है कि वह कथित तौर पर सीटी स्कैन टेक्नीशियन का काम कैसे कर रहा था? निस्संदेह, सरकारी अस्पताल के अंदर इस तरह से दायित्वों की भूमिका में बदलाव होना व्यवस्था की ऐसी नाकामियों की तरफ इशारा करता है, जो किसी व्यक्ति के कुकृत्य से कहीं अधिक आगे की बात है। निस्संदेह, यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना अस्पताल व अन्य सार्वजनिक संस्थानों में देख-रेख, कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों के पालन और जवाबदेही को लेकर विचलित करने वाले सवाल खड़े करती है। ऐसा प्रतीत होता है कि अस्पतालों में मरीजों की सुरक्षा के बुनियादी नियम-कानून एक साथ निरर्थक हो गए हैं।
सवाल यह है कि पहले ही रोगों, शारीरिक जीर्णता, मानसिक तनावों से गुजर रहे लोगों की सुरक्षा हेतु क्या कोई कायदे-कानून नहीं हैं? उनकी सुरक्षा महज राम भरोसे है? सरकारी अस्पतालों में मरीजों को कितने धक्के खाने पड़ते हैं और पक्की नौकरी वालों का आमतौर पर मरीजों से व्यवहार कैसा होता है, वह सर्वविदित है। पीड़िता के परिजनों ने आरोप लगाया कि उन्हें मरीज के साथ स्कैन-रूम में नहीं जाने दिया गया। वहां कोई महिला स्टॉफ मौजूद नहीं थी। दुर्भाग्य से महिला मरीज को ऐसे व्यक्ति के भरोसे छोड़ दिया गया, जिसे वास्तव में वहां खड़े रहने का भी हक नहीं था। ये चिकित्सा प्रक्रिया की कोई मामूली चूक नहीं है। ऐसी खामी में शोषण का खतरा लगातार बना रहेगा। विगत में भी कई ऐसी घटनाओं ने पूरे देश का ध्यान खींचा, जहां महिलाओं के साथ यौन हिंसा हुई। वर्ष 1973 में मुंबई के केईएम अस्पताल में नर्स अरुणा शानबाग के साथ जानलेवा यौन-हिंसा हुई थी। इसी तरह की कोलकाता के आरजीकर मेडिकल कालेज की दुखद घटना, जिसमें यौन हिंसा से मेडिकल की छात्रा की मौत हुई थी। विडंबना यह कि घटना का जमकर राजनीतिक दोहन तो होता है, लेकिन लोगों का गुस्सा कम होते ही सुधार के वायदे भी हवा हो जाते हैं। एक बार फिर पानीपत की दुखद घटना ने बताया है कि हमारे नीति-नियंताओं की याददाश्त बहुत कमजोर होती है। निश्चित रूप से पानीपत में हुई वीभत्स घटना को महज एक अपराध की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इस घटना के मद्देनजर मरीजों की सुरक्षा से जुड़े नीतिगत फैसलों में बदलाव लाया जाना चाहिए। ऐसे अस्पताल व सार्वजनिक सेवा केंद्रों से जुड़े, प्रत्येक आउटसोर्स किए गए विकल्पों की समीक्षा की जानी चाहिए। तैनात कर्मचारियों की कारगुजारियों-भूमिकाओं का सत्यापन किया जाना चाहिए। अस्पतालों में सीसीटीवी कवरेज का दायरा विस्तृत व मजबूत किया जाना चाहिए। साथ ही अनिवार्य रूप से सुरक्षाकर्मियों की तैनाती का प्रोटोकॉल लागू किया जाना जरूरी है। महत्वपूर्ण यह कि सार्वजनिक-निजी भागीदारी में जवाबदेही से बचने का मौका नहीं दिया जाना चाहिए। ध्यान रहे कि स्वास्थ्य सेवा में उपचार के साथ लोगों के भरोसे को बनाये रखना भी अनिवार्य शर्त है।

