देश की एक प्रमुख आईटी कंपनी की नासिक शाखा में यौन उत्पीड़न और जबरन धर्म परिवर्तन के प्रयासों के चौंकाने वाले आरोप परेशान करने वाले हैं। निस्संदेह, यह प्रकरण बेहद गंभीर है और इन आरोपों ने कार्यस्थल की सुरक्षा जैसे नजरअंदाज किए जा रहे महत्वपूर्ण मुद्दे पर फिर देश का ध्यान आकर्षित किया है। यह आरोप है कि पुरुष कर्मचारियों का एक समूह महिला सहकर्मियों को निशाना बनाने के लिए एक ‘संगठित गिरोह’ की तरह काम कर रहा था। निश्चित रूप से यह घटनाक्रम कंपनी प्रबंधन की उस घोर लापरवाही को ही उजागर करता है जिस के चलते समय रहते इस तरह के यौन उत्पीड़न व धर्म परिवर्तन की कोशिशों पर अंकुश नहीं लग सका। यह विडंबना ही है कि मानव संसाधन प्रबंधक ने कथित तौर पर पीड़िता को शिकायत दर्ज कराने से यह कहकर रोका कि –‘ऐसी चीजें होती रहती हैं।’ आक्षेप लगाया गया है कि इस प्रकरण में आरोपी का ही पक्ष लिया गया। निश्चित तौर पर यह दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रम कॉर्पोरेट जगत में व्याप्त विद्रूपताओं और एक गहरी तथा व्यापक विफलता की ओर ही इशारा करता है। जबकि दावा यह किया जाता रहा है कि कॉर्पोरेट जगत की प्राथमिकता कर्मचारियों की सुरक्षा और गरिमा को सुनिश्चत करना है। इसमें दो राय नहीं है कि जब यौन उत्पीड़न रोकथाम ढांचे को लागू करने के लिये जिम्मेदार उच्च पदों पर आसीन व्यक्तियों पर दुर्व्यवहार को सामान्य या मामूली बात समझने का आरोप लगता है, तो सारे संस्थागत सुरक्षा उपाय ध्वस्त हो जाते हैं। निर्विवाद रूप से यह एक दुर्भाग्यपूर्ण प्रवृत्ति है, जब पीड़ित महिला कर्मचारी को न केवल अपराधियों द्वारा बल्कि उनकी सुरक्षा का दायित्व संभालने वालों द्वारा भी चुप कराने के प्रयास किये जाते हैं। एक बार फिर से पुलिस के हस्तक्षेप और परामर्श के बाद ही कई पीड़ित महिला कर्मचारियों ने आगे आने का साहस जुटाया है। जिसके बाद ही मामले में प्राथमिकी दर्ज हो पायी है।
बहरहाल, इस दुर्भाग्यपूर्ण प्रकरण को लेकर एक असहज करने वाला प्रश्न यह उठता है कि क्यों भय, सामाजिक कलंक अथवा संस्थागत उदासीनता के कारण देश भर के विभिन्न कार्यस्थलों में ऐसे कितने ही यौन उत्पीड़न के मामले उजागर नहीं हो पाते हैं? इसमें दो राय नहीं कि इस मामले में जांच बिना किसी पुर्वाग्रह के आगे बढ़नी चाहिए। निर्विवाद रूप से आईटी कंपनी के नासिक प्रकरण में सांप्रदायिक या राजनीतिक रंग देने का प्रयास इस संकट की मूल चिंताओं को धूमिल करने का जोखिम जरूर पैदा कर सकता है। निस्संदेह, ऐसी घटनाओं को धार्मिक या वैचारिक नजरिये से देखना कॉर्पोरेट जवाबदेही और लैंगिक संवेदनशीलता वाले सुधारों की तत्काल आवश्यकता से ध्यान भटका सकता है। इस संवेदनशील विषय पर नजर रखने वाले तर्क देते हैं कि उत्पीड़न को संप्रदाय विशेष के अपराध के रूप में देखने के बजाय, इसे एक अधिकारी द्वारा अपने अधिकार के दुरुपयोग के रूप में देखा जाना चाहिए, जो किसी भी संस्थान में पारदर्शिता और प्रवर्तन की कमी वाले वातावरण में ही पनपता है। इस विचलित करने वाले प्रकरण में अधिकारियों की प्रतिक्रिया, जिसमें एक विशेष जांच दल का गठन भी शामिल है, स्वागत योग्य है। वहीं दूसरी ओर इस मामले में महिला आयोग द्वारा भी एक स्वतंत्र जांच की जा रही है, जो कि एक सराहनीय कदम कहा जा सकता है। हालांकि, कॉर्पोरेट जगत से जुड़े कार्यालयों में स्थायी परिवर्तन तभी संभव होगा जब कंपनियां ऐसे मामलों में ‘शून्य सहिष्णुता’ की घोषणा करेंगी। इसके साथ ही जरूरत इस बात की भी कि कार्यालयों में ऐसा निर्भयतापूर्ण वातावरण तैयार किया जाए कि कोई भी महिला कर्मचारी बिना डर के बोलने के लिये सशक्त बन सके। उन्हें सशक्त बनाने के लिये आंतरिक तंत्र को सक्रिय रूप से मजबूत बनाने की जरूरत है। इसके अलावा यह भी जरूरी है कि कंपनियों का शीर्ष प्रबंधन गाहे-बगाहे यह पड़ताल करता रहे कि सर्वाधिकार प्राप्त कोई अधिकारी असीमित अधिकारों की आड़ में उत्पीड़न के अपवित्र खेल में शामिल तो नहीं है। एक पारदर्शी व सतर्क व्यवस्था भविष्य में ऐसी घटनाओं पर अंकुश लगा सकती है।

