पिछले दिनों फरीदाबाद में ठीक से पढ़ाई न कर सकने वाली बच्ची की पिता द्वारा पिटाई करने से हुई मौत की खबर ने हर संवेदनशील इंसान को झकझोरा है। यह विश्वास करना कठिन है, कोई पिता इतना क्रूर हो सकता है कि महज गिनती न सीख पाने के कारण बच्ची की जान ले ले। यदि इस घटना के पीछे कोई परोक्ष कारण नहीं है तो निश्चय ही यह घटना किसी भी सभ्य समाज के लिये कलंक ही कही जाएगी। यह शर्म की बात ही है कि इस ज्ञान की सदी में किसी बच्ची की पिता के हाथों पढ़ाई के नाम पर मौत हो जाए। यह विडंबना ही है कि 21वीं सदी में भी हमारे समाज में मानसिक ग्रंथि की वह गांठ नहीं खुल पाई है, जो मानती है कि डर व मारपीट से बच्चों को सिखाया जा सकता है। ऐसी तमाम घटनाएं आज भी हमारे स्कूलों व घरों तक में सामने आती हैं। यदि स्कूल या कोचिंग में किसी बच्चे-बच्ची के साथ पढ़ाई के नाम पर आक्रामक व्यवहार होता है तो उम्मीद की जाती है कि परिवार उसके साथ मुश्किल समय में खड़ा होगा। लेकिन जब घर में माता-पिता ही हिंसक व्यवहार करने लगें तो मासूम किसके भरोसे रहेगा... कहने को देश में बच्चों के साथ होने वाले किसी भी हिंसक व्यवहार को रोकने के लिये तमाम तरह के प्रावधान सुरक्षा कवच उपलब्ध कराते हैं। लेकिन जब प्रवर्तन एजेंसियां ही उदासीन रहेंगी तो समस्या का समाधान संभव ही नहीं है। पहले तो स्कूलों में ही ऐसे मामलों पर पर्दा डालने की कोशिश की जाती है, फिर यदि मामला पुलिस या संबंधित विभाग के संज्ञान में आता भी है तो उसे रफा-दफा करने के प्रयास तेज हो जाते हैं। ऐसे मामलों में शिक्षक अभिभावक संगठन की भूमिका पर भी सवाल उठते रहे हैं। जिसमें अकसर शिक्षण संस्था के सुर में बोलने वाले अभिभावकों को ही रखा जाता है। आज भी यह एक गंभीर समस्या है और इसके गंभीर समाधान की जरूरत महसूस की जा रही है।
यह हमारे समाज की विडंबना ही कही जाएगी कि आज भी यह सोच बलवती है कि बच्चों के साथ सख्त व्यवहार से उनकी पढ़ने-लिखने की क्षमता में वृद्धि होती है। जबकि हकीकत यह है कि किसी भी आक्रामक व्यवहार से बच्चों पर गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। देश व दुनिया में हुए तमाम शोध व अध्ययन बताते हैं कि बच्चों के साथ सख्त व आक्रामक व्यवहार किए जाने से बच्चों की एकाग्रता व याद्दाश्त पर प्रतिकूल असर पड़ता है। उनकी निर्णय लेने की क्षमता भी प्रभावित होती है। जिसका नकारात्मक असर यह होता है कि बच्चे हीनभावना से ग्रसित हो जाते हैं। परिणाम स्वरूप वे अपनी कक्षा में पढ़ाई में पिछड़ जाते हैं। कालांतर यह भय व कुंठा जीवनभर उनका पीछा करती है। उनका आत्मविश्वास डिग जाता है। तब वे जीवन की स्पर्धा में भी दब्बू बनकर रह जाते हैं। यह भी विडंबना ही है कि आज भी बच्चों पर पढ़ाई का बोझ थोपने से पहले हमारे यहां किसी तरह का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण नहीं होता है कि बच्चे की अभिरुचि किन विषयों में है। सही मायनों में हर बच्चा अपने आप में विशिष्ट होता है। कुदरत उसकी रचना किसी खास मकसद के लिये करती है। लेकिन मां-बाप व शिक्षक पहचान नहीं पाते कि उसका रुझान किस दिशा में है। यदि समय रहते बच्चे की उस प्रतिभा को पहचाना जा सके और उस विषय व दिशा में उसे प्रोत्साहित किया जाए, तो वे अप्रत्याशित रूप से किसी भी क्षेत्र में शिखर की सफलता हासिल कर सकते हैं। इसके अलावा कुछ बच्चे कई तरह के जन्मजात व आनुवंशिक रोगों से ग्रस्त हो सकते हैं, जो उनकी सामान्य पढ़ाई में बाधक हो सकता है। कई बच्चों में जन्म से ही दृष्टि दोष या कोई अन्य शारीरिक व मानसिक विकार भी हो सकता है, जिसके चलते वे अपनी पढ़ाई को ठीक से पूरा नहीं कर पाते। फलतः उन्हें शिक्षकों व परिजनों के हिंसक व्यवहार का शिकार होना पड़ता है। आज बच्चों को संवेदनशील ढंग से देखने की जरूरत है ताकि उनकी पढ़ाई में आने वाली बाधाओं को समय रहते दूर किया जा सके।

