एक दशक पूर्व प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना यानी पीएमएफबीवाई इस मकसद से शुरू की गई थी कि देश के अन्नदाता के हित तमाम ऊंच-नीच में सुरक्षित रह सकें। सदियों से प्राकृतिक आपदाओं का त्रास पीढ़ी-दर-पीढ़ी भुगतते किसानों को सुरक्षा कवच प्रदान करने का प्रयास मोदी सरकार ने किया था। मकसद था किसान हितों को प्राथमिकता दी जाए। लेकिन जिस पीएमएफबीवाई के आज दस साल पूरे हो रहे हैं, वह आज एक चुनौतिपूर्ण मोड़ पर खड़ी है। जिसके वास्तविक लाभों पर मंथन करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। दरअसल, मोदी सरकार ने वर्ष 2016 में खेती-किसानी में एक बड़े जोखिम को कम से कम करने का प्रयास किया था। फसल बीमा से किसानों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। दरअसल, इस योजना का प्राथमिक उद्देश्य किसानों को जलवायु और बाजारों की बढ़ती अस्थिरता से बचाना था। लेकिन विडंबना यही है कि इस योजना के अपेक्षित लाभ किसानों को नहीं मिल पाये। बल्कि यह योजना बीमा कंपनियों के लिये दुधारू गाय बनकर रह गई। यहां तक कि भाजपा शासित राज्यों हरियाणा और राजस्थान से मिली प्राथमिक जानकारी से पता चला है कि इस योजना का लाभ किसान के बजाय बीमा कंपनियां जमकर उठा रही हैं। वर्ष 2023 से 2025 के बीच, हरियाणा में बीमा कंपनियों ने पीएमएफबीवाई के तहत 2,827 करोड़ रुपये का सकल प्रीमियम एकत्र किया था। लेकिन जहां तक फसलों को हुई क्षति के लिये दावों के भुगतान का प्रश्न है, केवल 731 करोड़ रुपये का ही भुगतान किया गया है। यानी बीमा कंपनियों को सीधे-सीधे 2,000 करोड़ से अधिक का लाभ हुआ है। इतना ही नहीं, शेष देश के आंकड़े भी कम चौंकाने वाले नहीं हैं। केवल तीन वर्षों में ही 82,015 करोड़ रुपये बीमा कंपनियों द्वारा प्रीमियम के रूप में एकत्रित किए गए। जबकि किसानों को क्षतिपूर्ति के लिये मात्र 34,799 करोड़ रुपये ही वितरित किए गए। बीमा कंपनियों को 47,000 करोड़ रुपये से अधिक का लाभ हुआ।
यह विडंबना ही है कि जिस महत्वाकांक्षी फसल बीमा योजना को किसानों को सुरक्षा कवच प्रदान करने के लिये लाया गया था, वो बीमा कपंनियों की मुनाफाखोरी का जरिया बन गई है। निश्चय ही देश की खाद्य सुरक्षा व किसान हित में योजना को बीमा कंपनियों के मुनाफे का जरिया बनने से रोकने की जरूरत है। बल्कि फसल बीमा योजना के क्षेत्र में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित की जानी चाहिए ताकि किसान को अधिक लाभ मिल सके। हरियाणा के कुछ हिस्सों में किसानों के दावों में की जाने वाली देरी अथवा किसानों के दावे खारिज किए जाने के खिलाफ धरना देने की बात भी सामने आई है। वहीं दूसरी ओर राजस्थान में फसल बीमा योजना में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। अनुचित लाभ उठाने के लिये जाली फॉर्म और फर्जी बैंक खातों का उपयोग किया गया है। निस्संदेह, यदि बीमा कंपनियां सिर्फ मुनाफा कमाती रहीं और किसान को योजना का लाभ पर्याप्त रूप से न मिला, तो निश्चित रूप से किसानों का इस योजना से भरोसा उठ जाएगा। ऐसे में यदि किसान अनियमित मौसम की मार, बढ़ते कर्ज के बोझ और नौकरशाही की बाधाओं से जूझते रहे तो वे योजना का लाभ पाने से वंचित हो जाएंगे। निस्संदेह, पीएमएफबीवाई किसानों के हितों को संरक्षित करने की एक महत्वाकांक्षी योजना है। जिसमें पारदर्शिता बढ़ाने के लिये सैटेलाइट इमेजरी, ड्रोन और तकनीक आधारित उपज अनुमान प्रणाली को एकीकृत करने का प्रयास किया गया था। इतना ही नहीं, पीएमएफबीवाई के अंतर्गत किफायती प्रीमियम केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा भारी सब्सिडी के साथ दिया जाता है। निर्विवाद रूप से प्रीमियम का बड़ा हिस्सा जनता के पैसे से भरा जाता है। जब प्रीमियम व दावा अनुपात विरोधाभासी हो तो करदाताओं के पास जवाबदेही मांगने का पूरा अधिकार है। निस्संदेह ऐसे वक्त में जब पीएमएफबीवाई ग्यारहवें वर्ष में प्रवेश कर रही है, सुधारों से इसका भविष्य तय होना चाहिए। पारदर्शी ऑडिट, दावों का तेजी से निपटान, बीमा कंपनियों की कारगुजारी पर कड़ी निगरानी की जरूरत व इस प्रक्रिया में किसानों का अधिक प्रतिनिधित्व आवश्यक है। तभी यह योजना किसानों के लिये सुरक्षा कवच बनेगी और किसानों का भरोसा बहाल होगा।

