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लाचार पर मार

बीमा कंपनियों व अस्पतालों का मकड़जाल

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बीमा कारोबार की जटिलताएं हमेशा से ही आमजन के लिए एक अनसुलझी गुत्थी रही हैं। हमारी भविष्य की आशंकाओं व भय पर फल-फूल रहे इस कारोबार को लेकर गाहे-बगाहे परेशान करने वाली खबरें आती रहती हैं। लेकिन इसके बावजूद तेजी से फल-फूल रहे विभिन्न बीमा कारोबारों की विसंगतियां कम नहीं हुई हैं। इसी तरह मेडिकल बीमा को लेकर बड़ी संख्या में शिकायतें सामने आती रही हैं। दरअसल, लगातार महंगी होती चिकित्सा सुविधाओं के दौर में, भविष्य में महंगे इलाज का खर्च उठाने का भरोसा दिलाकर बीमा कंपनियां लोगों को बीमा पॉलिसियां खरीदने को मानसिक रूप से तैयार कर लेती हैं। लेकिन विडंबना यह है कि जब वास्तव में कोई बीमार पड़ता है तो इलाज पर हुए खर्च के भुगतान को लेकर तमाम किंतु-परंतु बीमा कंपनियां करने लगती हैं। कई खामियां निकाली जाती हैं, जिनके बारे में बीमा धारक को पता ही नहीं होता है। कई बार तो छिपे-ढके कारण बताकर चिकित्सा खर्च की भरपाई करने से भी मना कर दिया जाता है। भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण यानी आईआरडीए के आंकड़ों ने बीमा कंपनियों के मुनाफा खेल को उजागर किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2024 में छब्बीस हजार करोड़ रुपये के बीमा दावे खारिज किए गए थे। निस्संदेह, ये आंकड़ा बीमा कंपनियों तथा पांच सितारा अस्पताल प्रबंधकों के अपवित्र गठबंधन को ही दर्शाता है। बाकायदा पिछले दिनों राज्यसभा में निजी अस्पतालों और स्वास्थ्य बीमा कंपनियों के अपवित्र गठजोड़ का मामला उठाया गया। जो हर साल हजारों लोगों को कर्ज व गरीबी की दलदल में धकेल देता है। अक्सर आरोप लगता है कि मरीजों को उपचार के मुकाबले बेहद कम राशि का भुगतान किया जाता है। ऐसा नहीं है कि प्राइवेट अस्पतालों व बीमा कंपनियों के मध्य सांठगांठ के मामले सामने नहीं आते। लेकिन हमारा नियामक-तंत्र सारे घटनाक्रम की अनदेखी कर देता है। विडंबना यह भी है कि केंद्र व राज्य सरकारों के स्तर पर भी इस मुनाफाखोरी पर समय रहते अंकुश नहीं लगाया जाता है, जिससे लोगों को उलटे उस्तरे से मूंडने का खेल बदस्तूर जारी रहता है।

दरअसल, लोग जब कोई स्वास्थ्य बीमा कराते हैं तो उन बारीकियों के बारे में नहीं बताया जाता है, जिसके आधार पर मरीजों के चिकित्सा बीमा राशि को खारिज किया जाता है। अक्सर इलाज के बड़े खर्चे के दावे को कई मीन-मेख निकालकर नकार दिया जाता है। कई बार तो अमानवीयता की हदें भी सामने आती हैं जब मरीज की मृत्यु पर, खर्च चुकाने में असमर्थ होने पर अस्पताल प्रबंधक परिजनों को पार्थिव शरीर तक को देने से मना कर देते हैं। जबकि इस बारे में अदालत व सरकार की तरफ से सख्त आदेश हैं कि बकाया राशि के लिए किसी मरीज के शव को रोका नहीं जा सकता। दरअसल, चिकित्सा बीमा आज देश-दुनिया में बड़ा कारोबार बन गया है। लेकिन पश्चिमी देशों में भुगतान में ईमानदारी व कार्यशैली में पारदर्शिता से इस व्यवसाय का विस्तार हुआ है। लेकिन भारत में ईमानदारी, पारदर्शिता के अभाव व दोषपूर्ण कार्यशैली से चिकित्सा बीमा के औचित्य पर ही सवाल उठते हैं। सवाल उन सरकारी विभागों पर भी है, जो बीमा कंपनियों की मनमानी पर अंकुश लगाने की पहल नहीं करती। तभी साल में करोड़ों रुपये की उगाही करने वाली बीमा कंपनियां कई तकनीकी वजहों से मरीज के इलाज में लगी रकम का बड़ा हिस्सा देने से मना कर देती हैं। वास्तव में जरूरत इस बात की है कि बीमा कराते वक्त ईमानदारी से बीमे से जुड़ी शर्तों से उपभोक्ता को अवगत कराया जाए। लेकिन इससे जुड़े जटिल व अस्पष्ट नियमों को पारदर्शी ढंग से समझाया ही नहीं जाता, जिसको वे बाद में इलाज कराने के उपरांत भुगतान रोकने का जरिया बना लेती हैं। जिसके चलते अक्सर अस्पताल में भर्ती होने पर आए खर्च और बीमा कंपनियों द्वारा भुगतान की गई राशि में बड़ा अंतर नजर आता है। निस्संदेह, देश में इस दिशा में उच्चस्तरीय स्वतंत्र जांच होनी चाहिए कि मरीजों को बीमे का कितना लाभ मिला और अस्पताल तथा बीमा कंपनियों के मुनाफे का स्तर क्या रहा। इस प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए निगरानी हेतु एक राष्ट्रीय तंत्र बनाया जाना जरूरी है।

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