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स्वास्थ्यवर्धक समाधान

हरियाणा का लड्डू मॉडल अपनाए देश

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हमने पश्चिमी जीवन-शैली, खानपान व अंग्रेजी चिकित्सा प्रणाली के सम्मोहन में तमाम ऐसे स्वास्थ्यवर्धक उपायों की अनदेखी कर दी है, जो हमारी शारीरिक जरूरतों को पूरा करती थे। ये खानपान से जुड़े उपाय न केवल सस्ते और पौष्टिकता से भरपूर थे, बल्कि प्राकृतिक उपचार के चलते इनके साइड इफेक्ट भी नहीं थे। हरियाणा के एक सरकारी स्कूल में विटामिन डी युक्त लड्डुओं की आशातीत सफलता सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति के लिये एक महत्वपूर्ण सबक देती है। सबक यह कि समाधान जरूरी नहीं है महंगे और आयातित ही हों, या साइड इफेक्ट देने वाले हों। वे स्थानीय स्तर पर उपलब्ध, वैज्ञानिक रूप से सटीक और हमारी जरूरतों के अनुरूप हो सकते हैं। यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि विटामिन डी की कमी भारत की सबसे कम पहचानी जाने वाली स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक है। खासकर देश की किशोरियों में। भारत में धूप की प्रचुर मात्रा उपलब्ध है,लेकिन जीवनशैली में बदलाव, बाहरी गतिविधियों को सीमित करने वाली सामाजिक बंदिशें और आहार में विविधता की कमी जैसे कारकों के कारण विटामिन डी की व्यापक कमी पायी जाती है। निश्चित रूप से इसकी कमी के चलते हड्डियों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूलता, रोग प्रतिरोधक क्षमता में गिरावट और समग्र स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक प्रतिकूल प्रभाव होते हैं। इसी पृष्ठभूमि में, हरियाणा का प्रयोग उल्लेखनीय है, जहां पौष्टिक लड्डुओं ने स्कूली छात्राओं में विटामिन डी के स्तर में उल्लेखनीय सुधार किया है। जो सहज उपलब्धता और प्रभावशीलता के कारण उल्लेखनीय है। इस पहल की ताकत इसकी सांस्कृतिक सहजता में निहित है। लड्डुओं को पूरक या दवा के रूप में नहीं, बल्कि भोजन के रूप में देखा जाता है। जो इसका अनुपालन सुनिश्चित करता है और पोषण को दैनिक दिनचर्या में सहजता से एकीकृत किया जा सकता है। इसके अवयवों की स्थानीय उपलब्धता और कीमत में कमी एक अन्य विशिष्ट गुण है, जो सरकारी स्कूलों में कम लागत पर उपलब्ध कराने में सहायक बनता है। यानी अधिक छात्राओं को उपलब्ध कराने में मददगार हो सकता है।

दरअसल, बायोफोर्टिफाइड मशरूम का उपयोग करके की गई यह पहल दर्शाती है कि स्थानीय अनुसंधान संस्थान रोजमर्रा की समस्याओं के व्यावहारिक समाधान में कैसे योगदान दे सकते हैं। इस प्रायोगिक सफलता को सावधानीपूर्वक और प्रतिबद्धता के साथ बड़े पैमाने पर लागू किए जाने की जरूरत महसूस की जाती रही है। पोषण संबंधी हस्तक्षेप पारदर्शी डेटा, नियमित निगरानी और स्पष्ट गुणवत्ता मानकों द्वारा सुनिश्चित किया जाना भी बेहद जरूरी है। पौष्टिकता का विस्तार रणनीतियों का पूरक होना चाहिए, न कि उनका विकल्प। इन रणनीतियों में छात्र-छात्राओं के लिये नियमित धूप के सेवन को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इसके अलावा दोपहर के भोजन में सुधार करना और किशोर स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना शामिल किया जाना चाहिए। इसके साथ ही व्यापक नीतिगत संदेश भी जुड़ा है। भारत में कुपोषण के खिलाफ लड़ाई में अक्सर कैलोरी और प्रोटीन पर ही ध्यान केंद्रित किया जाता रहा है। यह विडंबना ही है कि हमने कभी-कभार ही सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी पर ध्यान दिया है। यही असंतुलन ही हमारे अपेक्षित परिणामों को कमजोर करता है। भूख के मनोविज्ञान के अनुरूप खाद्य विज्ञान, स्कूल आधारित हस्तक्षेप और विकेंद्रीकृत नवाचार में निरंतर निवेश की आवश्यकता महसूस की जाती रही है। इसके अलावा हमें उस प्राचीन ज्ञान पर भी ध्यान देना चाहिए, जिसका अनुसरण करते हुए सदियों से हमारी पीढ़ियां स्वस्थ रहने के लिये प्रयोग करती रही हैं। ऋतु चक्र के अनुरूप भोजन और शरीर की प्रकृति जैसे आहार-विहार इसका हिस्सा रहा है। जिसकी आयुर्वेद, योग व प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धांतों द्वारा व्यापक रूप में व्याख्या की गई है। सही मायनों में भारतीय परिवेश के अनुरूप खानपान और जीवनशैली के अनुकरण में ही हमारी अनेक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के समाधान निहित हैं। जिसकी अनदेखी की हमें कीमत भी चुकानी पड़ती है। हरियाणा मॉडल को मौजूदा योजनाओं में शामिल किया जा सकता है। जिससे स्कूलों को निवारक स्वास्थ्य देखभाल के लिये अग्रणी केंद्र बनाया जा सके। इसकी वजह यह है कि पोषण का संबंध देश के आने वाले भविष्य के निर्माण से है।

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