सेहत की सुध

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बच्चों को जंक फूड से बचाने की पहल

कोरोना से बचाव की मुहिम की सबसे पहली गाज स्कूल-कालेजों पर ही गिरी है। कहने को भले ही विद्यार्थी ऑनलाइन कक्षाओं के जरिये पढ़ाई कर रहे हैं, मगर यह व्यवस्था परंपरागत शिक्षा की जगह नहीं ले सकती। सबसे बड़ी बात यह कि बच्चों की शारीरिक सक्रियता व खेलकूद की गतिविधियां बिलकुल ठप पड़ी हैं। उस पर उनका जंक फूड का रुझान सेहत पर भारी पड़ रहा है। मोटापे से लेकर तमाम तरह की बीमारियां सिर उठा रही हैं। कोरोना काल की  एक बड़ी सकारात्मक उपलब्धि यह कही जा सकती है कि संक्रमण के बचाव के मकसद से घर पर बने खाने पर जोर दिया गया। कहा गया कि पिज्जा-बर्गर की संस्कृति हमारी जीवन शक्ति को शिथिल करती है। बहरहाल, अब भविष्य में स्कूलों की कैंटीन व उसके आसपास जंक फूड की बिक्री नहीं हो पायेगी। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण यानी एफएसएसएआई ने स्कूल की कैंटीन और स्कूल के गेट के पचास मीटर के दायरे में बच्चों को पिज्जा, बर्गर, चिप्स, छोले-भटूरे, कोल्ड ड्रिंक्स आदि जंक फूड बेचने पर रोक लगाने का मन बनाया है। इसे अपराध की श्रेणी में रखा गया है। सिर्फ बिक्री ही नहीं, ऐसे पदार्थों का प्रचार भी अपराध माना जायेगा। इसका उल्लंघन करने पर फूड सेफ्टी स्टैंडर्ड एक्ट के तहत जुर्माना या जेल की सजा भी हो सकती है। संस्था द्वारा स्कूलों के लिये रेगुलेशन तैयार कर लिया गया है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री की मंजूरी के उपरांत इसका नोटिफिकेशन जारी होगा। ये नियम अगले वर्ष जुलाई से लागू हो जायेंगे। इसके अलावा स्कूलों की कैंटीन को लेकर सख्त नियम तय किये गये हैं। अब कैंटीन के संचालक को बाकायदा लाइसेंस लेना होगा। कैंटीन के बोर्ड पर प्रदर्शित करना अनिवार्य होगा कि बच्चे क्या खा सकते हैं और क्या नहीं। इतना ही नहीं, दूषित और खराब गुणवत्ता वाला खाना पाये जाने पर बड़ा जुर्माना लगेगा। जान के संकट पर उम्रकैद भी हो सकती है। निस्संदेह बच्चों की सेहत से खिलवाड़ की इजाजत किसी भी कीमत पर नहीं दी जा सकती।

दरअसल, बच्चों में मोटापे और इससे जनित रोगों को लेकर देश में चिंता जतायी जाती रही है। खासकर स्कूलों में तैलीय खाने की बिक्री पर रोक लगाने की मांग की जाती रही है। वास्तव में हाल-फिलहाल कंप्यूटर-लैपटॉप और मोबाइल के खेलों में घंटों उलझे रहने वाले बच्चे मैदान के खेलों के प्रति उदासीन हुए हैं। दूसरी ओर उनके खानपान पर फास्ट फूड की उपस्थिति बढ़ी है जो अभिभावकों की चिंता का सबब बना हुआ है। ऐसे में उनकी सेहत पर जंक फूड के दुष्प्रभाव को रोकना जरूरी है। निस्संदेह एफएसएसएआई की बच्चों की खानपान की आदतों को सुधारने के दिशा में यह पहल स्वागत योग्य है। सुरक्षित खाद्य एवं सुरक्षित आहार विनिमय के मसौदे के क्रियान्वयन से उम्मीद जगी है कि बच्चों में स्वास्थ्य के प्रति चेतना जगेगी। शिक्षक व स्कूल प्रबंधन के अलावा अभिभावक भी इसमें निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। आवश्यकता इस बात की भी है कि महानगरों में ही नहीं बल्कि छोटे शहरों, कस्बों व ग्रामीण इलाकों में भी चेतना अभियान चलाया जाये। इन नियमों के क्रियान्वयन के लिये पारदर्शी व्यवस्था व जवाबदेही तय की जाये। समय-समय पर कैंटीनों में फूड लाइसेंस की जांच की जाती रहे। बच्चों को खानपान के तौर-तरीकों के बारे में अवगत कराया जाये। खानपान की आदतों में सुधार के लिये जरूरी है कि विद्यार्थियों के घर में प्रयोग होने वाले तथा टिफिन में शामिल खाद्य पदार्थों का वर्गीकरण किया जाये। स्कूल में जंक फूड व सॉफ्ट ड्रिंक के विकल्प उपलब्ध कराने की भी जरूरत है। उन्हें सुरक्षित और पौष्टिक भोजन खाने के लिये प्रोत्साहित किया जाये। साथ ही हानिकारक खाद्य पदार्थों के भ्रामक विज्ञापन भी प्रतिबंध के दायरे में लाये जायें। नियम बनाने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि इनके क्रियान्वयन की निगरानी नियमित रूप से की जाती रहे।

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