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हरियाणा का भूजल-संकट

जल प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार जरूरी

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निस्संदेह, हरियाणा ने कृषि की उन्नति में नये मानक स्थापित किए हैं। देश की खाद्य सुरक्षा में इस राज्य के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। कृषि क्षेत्र में कारगर रणनीतियों व आधुनिक तकनीकों ने हरियाणा के किसानों के जीवन में बड़ा बदलाव किया है। लेकिन इससे इतर एक चिंताजनक स्थिति यह है कि राज्य में भूजल संकट एक खतरनाक स्तर को पार कर रहा है। बताया जा रहा है कि राज्य के तीस फीसदी से अधिक गांव भूजल संकट के खतरे की जद में हैं। विडंबना यह है कि इन क्षेत्रों में भूजल का दोहन पुनर्भरण से कहीं अधिक है। जो राज्य में चेतावनी के संकेत स्पष्ट कर रहे हैं। दरअसल, ग्लोबल वार्मिंग संकट के चलते बारिश के पैटर्न में व्यापक बदलाव आया है। जिस अनियमित बारिश को कभी मौसमी समस्या माना जाता था, वह अब एक संरचनात्मक संकट में बदल गयी है। निश्चित रूप से मानसून व बारिश की आवृत्ति में अनिश्चितता के चलते कृषि, पेयजल सुरक्षा व दार्घकालिक आर्थिक स्थिरता के लिये खतरा पैदा हो गया। बारिश की कमी की पूर्ति भूजल के अंधाधुंध दोहन से की जाती है। वैसे इस संकट के मूल में समस्या की वजह पानी की अत्यधिक खपत करने वाला विकास मॉडल भी है। पिछले दशकों में धान व गेहूं की उत्पादकता पर किसानों की निर्भरता अत्यधिक बढ़ी है। जिसमें बहुत सिंचाई की जरूरत होती है। वहीं दूसरी ओर राजनीतिक समीकरणों के चलते किसानों को लुभाने के लिये मुफ्त या रियायती बिजली का चलन भी बढ़ा है। जिससे भूजल के अंधाधुंध दोहन को बढ़ावा ही मिला है। विडंबना यह है जैसे-जैसे भूजल का स्तर गिरता है, ट्यूबवेल हर साल और गहरे खोदे जाते रहे हैं। कोशिश होती रही है कि इससे जल संकट बढ़ने से पानी की कमी पर पर्दा पड़ा रहे। यही वजह है कि इसका नकारात्मक असर आज मध्य और दक्षिण हरियाणा के बड़े क्षेत्र में दिखायी दे रहा है। जहां जलस्तर खतरनाक स्तर तक गिरता नजर आ रहा है।

वहीं दूसरी ओर हरियाणा में तेजी से बढ़ रहे शहरीकरण ने जल संकट को और गहरा कर दिया है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में बहुत तेजी से हुए शहरीकरण ने भूजल का दोहन उसकी स्थायी सीमा से बहुत अधिक हद तक बढ़ाया है। इस बेलगाम भूजल दोहन पर नियामक संस्थाओं की निगरानी ना के बराबर है। वहीं एक चिंताजनक पहलू यह भी है कि तेजी से बढ़ते कंक्रीटीकरण और आर्द्र भूमि के क्षरण से भूजल का प्राकृतिक पुनर्भरण बाधित हुआ है। दूसरी ओर जलवायु परिवर्तनशीलता, अनियमित मानसून और घटते वर्षा दिवसों ने भूजल पुनर्भरण को और अधिक कम कर दिया है। जिसके चलते जलभंडारों के पुनर्जीवित होने की संभावनाएं लगभग क्षीण हो गई हैं। भूजल स्तर में गिरावट का खमियाजा किसानों को भी उठाना पड़ रहा है। खेतों के लिये सिंचाई जल उपलब्ध कराने की लागत में भी लगातार वृद्धि हो रही है। दरअसल गहरे बोरवेल के लिये अधिक बिजली और अधिक निवेश की आवश्यकता होती है। यही वजह है कि ग्रामीण पेयजल योजनाएं स्थिति से निपटने के लिये संघर्ष कर रही हैं। दूसरी ओर कम गुणवत्ता वाले जलभंडारों तक जल-दोहन की स्थिति पहुंचने से प्रदूषण का खतरा बढ़ा है। निस्संदेह, इस संकट को गंभीरता से लेने की जरूरत है। यदि इस सकंट की अनदेखी करके स्थिति को अनियंत्रित छोड़ दिया जाएगा तो इसके व्यापक नकारात्मक प्रभाव हो सकते हैं। इससे जहां एक ओर आजीविका का संकट बढ़ेगा, वहीं फसलों को लेकर अस्थिरता होगी और कालांतर जल को लेकर सामाजिक संघर्ष उत्पन्न हो सकता है। हालांकि, इस संकट के समाधान को लेकर नीतिगत उपाय मौजूद हैं, लेकिन उन्हें गंभीरता से लेने की जरूरत है। फसल विविधीकरण योजनाएं और पुनर्भरण परियोजनाएं सही दिशा में उठाये गए कदम हैं, लेकिन उनका पैमाना और कार्यान्वयन चुनौती के अनुरूप नहीं है। भूजल प्रबंधन, मांग में कमी की तुलना में आपूर्ति बढ़ाने पर अधिक केंद्रित रहा है। निश्चित रूप से हरियाणा को अपनी जल प्राथमिकताओं को तत्काल पुनर्निधारित करने की आवश्यकता है। जरूरत है कम पानी की फसलों को प्रोत्साहित करें, बिजली सब्सिडी युक्तिसंगत बने, शहरी व वाणिज्यिक उपयोग के लिये जल दोहन सख्ती से विनियमित हो व पुनर्भरण क्षेत्रों की रक्षा की जाए।

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