गिग वर्कर्स की हड़ताल और उनके मुश्किल हालात को लेकर समाज में बढ़ती फिक्र के बाद हुए सरकारी हस्तक्षेप से गिग वर्कर्स की बड़ी मुश्किल हल हुई है। कोहरे-ठंड और बेतरतीब ट्रैफिक के बीच गिग-वर्कर्स पर दस मिनट में सामान उपभोक्ता तक पहुंचाने का दबाव एक बड़े तनाव की वजह बना हुआ था। गिग-वर्कर्स को हीमैन मानकर द्रुत गति से वाहन दौड़ाकर अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ती थी। कुछ डिलीवरी ब्वॉयज के दुर्घटनाग्रस्त होकर जान गंवाने व घायल होने के भी समाचार थे। अब यह सुखद ही है कि केंद्रीय श्रममंत्री मनसुख मांडविया के हस्तक्षेप के बाद क्विक काॅमर्स कंपनियां कष्टदायक दस मिनट में डिलीवरी की व्यवस्था खत्म करने को तैयार हो गई हैं। इटर्नल के स्वामित्व वाली इकाई ब्लिंकिट, जिसने दस मिनट में डिलीवरी को अपने कारोबार की आक्रामक विज्ञापन रणनीति का हथियार बना लिया था, ने अब अपने मंचों से दस मिनट में डिलीवरी का दावा हटा लिया है। निश्चित रूप से यह अमानवीय ही था कि बेकारी का त्रास झेलते युवाओं पर आनन-फानन दस मिनट में सामान उपभोक्ता तक पहुंचाने का दबाव बनाया जाए। लंबी ड्यूटी, कम पैसा और जल्दी सामान पहुंचाने के दबाव में बड़ी संख्या में गिग-वर्कर्स काम छोड़ जाते थे। आजकल ठंड के मौसम में उपभोक्ता घर से बाहर निकलने से परहेज कर रहे हैं। अत: उत्तर भारत में भीषण सर्दी और कोहरे के बीच दस मिनट में तेजी से सामान पहुंचाना दुष्कर कार्य था। भारत में आम ट्रैफिक की जटिल स्थिति किसी से छिपी नहीं है। सड़क हादसों के कारण उनका जीवन जोखिम में बना रहता था। इतना ही नहीं, कई बार डिलीवरी ब्वॉयज को बहुमंजिला इमारतों और कालोनियों के सुरक्षा गार्डों से जूझना पड़ता था, जिससे उन्हें सामान पहुंचाने में देरी हो जाती थी। फिर उपभोक्ता के मोबाइल पर मिले ओटीपी के बाद उनका सामान डिलीवर माना जाता था। समय पर सामान की डिलीवरी न होने पर उनके कार्य प्रदर्शन का मूल्यांकन कमतर आंका जाता है।
दरअसल, गिग वर्कर्स को अच्छी रैंक तभी मिलती है जब वे दस मिनट में सामान पहुंचा देते हैं, जिसके चलते वे मानसिक तनाव में रहते थे। उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों दस मिनट में डिलीवरी का दबाव झेलते तथा मेहनताने में कमी आदि मांगों को लेकर गिग-वर्कर्स ने देशव्यापी हड़ताल की थी। हालांकि, कंपनी मालिकों ने साल के आखिरी दिनों में उत्सव के माहौल में डिलीवरी बाधित होते देख हड़ताल को कामयाब नहीं होने दिया, लेकिन इस हड़ताल से पूरे देश का ध्यान गिग-वर्कर्स की जायज मांगों की तरफ गया। आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा समेत कई राजनेताओं ने भी गिग-वर्कर्स के मुद्दे को जोर-शोर से उठाया। पिछले दिनों ध्यान आकर्षण के लिए बाकायदा राघव चड्ढा डिलीवरी ब्वॉय की ड्रेस पहनकर सामान डिलीवर करने भी गए। निस्संदेह, डिलीवरी ब्वॉयज का काम बेहद चुनौतीपूर्ण है, काम के घंटे बहुत ज्यादा हैं और उसके अनुपात में मेहनताना बेहद कम है। इन्हीं चिंताओं के बाद केंद्र सरकार द्वारा लाया गया नया लेबर कोड चर्चा में आया, जिसमें उल्लेख है कि गिग वर्कर्स की सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उन्हें पर्याप्त सुविधाएं नियोक्ता कंपनी द्वारा दी जाएं। यह विडंबना ही है कि गिग वर्कर्स की मेहनत से क्विक कॉमर्स कंपनियों का कारोबार तो तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन गिग वर्कर्स की माली हालत नहीं सुधरी है। यही वजह है कि बड़ी संख्या में गिग वर्कर्स थोड़े समय काम करके नौकरी छोड़ देते हैं। निर्विवाद रूप से आज जरूरी है कि गिग वर्कर्स ही नहीं, तमाम असंगठित क्षेत्र के कामगारों को अविलंब सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाया जाए। उन्हें बीमा, न्यायोचित काम के घंटे, समय पर समुचित भुगतान व चिकित्सा आदि सुविधाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए। इस दिशा में कानून बनाना ही काफी नहीं होगा, जरूरत लगातार इस बात की निगरानी की भी होगी कि धरातल पर इन कानूनों का कितना अमल हो रहा है। निश्चित रूप से असंगठित क्षेत्र के हर कामगार की सुध ली जानी चाहिए। तभी देश में श्रम की गरिमा स्थापित हो सकेगी। यही देश की युवा श्रमशक्ति का भी सम्मान होगा।

