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खौफ का खेल

चंडीगढ़ तक पहुंची गैंगवार की तपिश

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सिटी ब्यूटीफुल के नाम से मशहूर शहर चंडीगढ़ कुछ समय पहले तक, अपनी चाक-चौबंद सुरक्षा व्यवस्था के लिये मशहूर रहा है। इस शहर को लंबे समय तक हिंसा व अपराधों से सुरक्षित माना जाता रहा है। लेकिन विडंबना है कि अब यह तेजी से असुरक्षित होता जा रहा है। पिछले दिनों चंडीगढ़ का पॉश इलाका माने जाने वाले सेक्टर नौ में एक युवा प्रॉपर्टी डीलर की दिनदहाड़े हुई चौंकाने वाली हत्या ने शहर की शांति व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाया। वहीं दूसरी ओर सुरक्षा की सावधानीपूर्वक बनायी गई इस केंद्रशासित प्रदेश की छवि को धूमिल किया है। निस्संदेह, इस केंद्र शासित प्रदेश के सबसे समृद्ध और सुरक्षित इलाकों में से एक सेक्टर में, इस तरह की सरेआम निर्मम हत्या होना न केवल चिंताजनक है, बल्कि यह बेहद गंभीर अपराध बढ़ने का संकेत भी देता है। शुरुआती रिपोर्टों में इस अपराध को गैंगस्टरों की आपसी दुश्मनी से जोड़ कर देखा जा रहा है। जिसमें लकी पटियाला और बबीहा गैंग जैसे नामों का जिक्र सामने आया है। यह हत्याकांड एक चिंताजनक प्रवृत्ति को रेखांकित करता है कि अब संगठित अपराध उन शहरी केंद्रों में लगातार बढ़ रहे हैं, जिन्हें कभी इस तरह की गैंगवार से अछूता समझा जाता था। माना जाता रहा है कि चंडीगढ़ पुलिस यथाशीघ्र अपराध की जड़ तक पहुंचकर अपराधियों पर शिंकजा कसने में सफल रहती है। यह चौंकाने वाली बात है कि हाल के वर्षों में पंजाब में गैंगवार में होने वाली हिंसा और जबरन वसूली के रैकेट में अप्रत्याशित वृद्धि देखी गई है। जिसका सबसे प्रमुख उदाहरण मशहूर सिंगर सिद्धू मूसेवाला की हत्या है। निस्संदेह, सेक्टर नौ में दिनदहाड़े हुई हत्या से साल 2017 में हुए आकांक्षा सेन हत्याकांड की टीस एक बार फिर उभर आई। यह भी एक ऐसा ही हाई-प्रोफाइल मामला था। जिसमें न्याय मिलने में लगातार हुई देरी के कारण आज भी लोगों के मन में गहरी कसक व्याप्त है। निस्संदेह, दोनों ही हत्याकांडों से जुड़ी समानताएं चिंता बढ़ाने वाली हैं। मसलन, अपराध सार्वजनिक रूप से हुए हैं। जिससे अपराध को रोकने की पुलिस की क्षमता पर सवाल उठाए गए हैं। इसमें एक सवाल जवाबदेही का भी है।

वास्तव में इस तरह सरेआम दिन दहाड़े होने वाले अपराध सार्वजनिक विमर्श में कई संवेदनशील सवालों को जन्म देते हैं। इस घटना से जुड़ा सबसे चिंताजनक पहलू है हत्याकांड में शामिल रहे अपराधियों का दुस्साहस। निर्विवाद रूप से सार्वजनिक स्थल के बाहर दिन-दहाड़े की गई हत्या बताती है कि ये अपराधियों में कानून-व्यवस्था के प्रति डर समाप्त होने का संकेत है। जिसके परिणामस्वरूप कानून प्रवर्तन की निवारक क्षमता कमजोर हो जाती है। निस्संदेह, इस तरह की घटनाओं को लेकर खुफिया जानकारी जुटाने, पुलिस समन्वय और ऐसे हमलों को रोकने की क्षमता पर भी गंभीर सवाल उठते हैं। कोई शक नहीं कि चंडीगढ़ को अब किसी भी तरह की लापरवाही का शिकार बनने नहीं दिया जा सकता। प्रशासन को प्रतिक्रियात्मक पुलिसिंग के बजाय सक्रिय और खुफिया जानकारी आधारित रणनीति अपनानी होगी। निश्चित रूप से ऐसे अपराधों पर तभी अंकुश लगाना संभव हो पाएगा, जब पुलिस का लक्ष्य आपराधिक गिरोहों, उनकी आर्थिक मदद करने वालों तथा उनके सहयोगियों के गठजोड़ को नेस्तनाबूद करना होगा। इसमें दो राय नहीं कि आपराधिक मामलों में तुरंत जांच, पुलिस की प्रत्यक्ष उपस्थिति और समय पर न्याय मिलने से न केवल जनता का विश्वास बहाल होगा, बल्कि शहरों को आने वाले समय में ऐसे गैंगवार से जुड़ी हिंसा से भी बचाया जा सकेगा। निस्संदेह, नई तकनीक और इंटरनेट आधारित आपराधिक गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिये हाइटैक पुलिस की जरूरत होगी। नई तकनीक जहां अपराधियों का हथियार बनती है, वहीं उन पर शिकंजा कसने में मददगार हो सकती है। बशर्ते इन संसाधनों का उपयोग सावधानी व तत्परता से किया जाए। तब अपराधियों की गैंगवार पर नकेल डालने में खुफिया जानकारी और आधुनिक तकनीक खासी मददगार हो सकती हैं। सिटी ब्यूटीफुल में कानून व्यवस्था की खूबसूरती बचाने के लिये जरूरी कदम उठाने की सख्त जरूरत है। निस्संदेह, यही वक्त की मांग भी है।

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