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दोस्ती अखबार से

छात्रों में एकाग्रता-रचनाशीलता को मिलेगा बढ़ावा

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ऐसे दौर में जब बच्चे डिजिटल मीडिया को अंतिम सत्य मानने लगे हैं, उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा स्कूलों में अखबार पढ़ना अनिवार्य बनाना एक सुखद अहसास ही है। सुबह की प्रार्थना के दौरान दस मिनट तक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय खबरें व संपादकीय पढ़ना अनिवार्य किया गया है। बाकायदा रोज पांच कठिन शब्द अर्थ के साथ ब्लैकबोर्ड पर दर्ज होंगे। निश्चय ही इस प्रयास से जहां बच्चों में पढ़ने की संस्कृति, शब्द व सामान्य ज्ञान बढ़ेगा, वहीं उनके स्क्रीन टाइम में कमी आ सकेगी। निर्विवाद रूप से इससे धीरे-धीरे छात्रों की पढ़ने की प्रवृत्ति बढ़ेगी। बच्चे पढ़ने की संस्कृति से जुड़कर भावनात्मक, बौद्धिक व सामाजिक सरोकारों से समृद्ध होंगे। बहुत संभव है कि यदि इस अभियान को निरंतरता के साथ चलाया जाता रहा तो बच्चे पुस्तकालयों में रुचि लेने लगेंगे। विडंबना यह है कि आज बच्चों की उंगलियां पुस्तकों के पन्ने पलटने के बजाय मोबाइल के की-बोर्ड पर थिरकती रहती हैं। चिंताजनक स्थिति है कि भारत में पांच साल तक के बच्चे भी रोज दो घंटे से अधिक समय स्क्रीन पर बिताते हैं। एक सर्वे में चौंकाने वाली बात यह भी सामने आई कि दो साल जैसी कम उम्र के बच्चे भी रोज 1.2 घंटे स्क्रीन पर लगाते हैं। गंभीर स्थिति यह है कि एक चौथाई बच्चों की इंटरनेट तक पहुंच है। ऐसे वक्त में जब आस्ट्रेलिया में 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की सोशल मीडिया तक पहुंच को रोका गया है, भारत में दस साल से कम उम्र के बच्चों तक के सोशल मीडिया अकाउंट बने हुए हैं।

दरअसल, उत्तर प्रदेश सरकार ने फैसला किया है कि मॉर्निंग असेंबली के दौरान बच्चों को अंग्रेजी व हिंदी के समाचार पत्र पढ़ने को दिए जाएंगे। ये निर्णय सभी सरकारी सेकेंडरी और बेसिक स्कूलों के लिये है, लेकिन यदि निजी स्कूल भी चाहें तो वे भी ऐसा निर्णय ले सकते हैं। निस्संदेह, बच्चों को स्कूली पाठ्यक्रम से अलग भी पुस्तकें पढ़ने की आदत डालनी चाहिए। तमाम सर्वे बता रहे हैं कि आज भी अखबार भरोसेमंद सूचना माध्यम हैं। कई चरणों में संपादकीय मंडल खबरों को सुरक्षित तरीके से जांच कर प्रकाशित करता है। यूं तो कथित सोशल मीडिया पर सूचनाओं का अंबार लगा है, लेकिन संपादक नामक संस्था के न होने से उनकी विश्वसनीयता संदिग्ध है। निहित स्वार्थी तत्व भ्रामक सूचनाएं लगातार प्रसारित करते रहते हैं। निस्संदेह, बच्चे जब अखबार पढ़ेंगे तो अखबारों के संपादकीय व लेख पढ़कर वे अपना दृष्टिकोण विकसित कर सकेंगे। साथ ही उनकी भाषा समृद्ध होगी। आजकल के छात्रों के सबसे कम नंबर मातृभाषा में ही आते हैं। संकट यह भी है कि आज सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बच्चों की मासूमियत छीन रहे हैं और उन्हें समय से पहले वयस्क बना रहे हैं। शिक्षकों की उपस्थिति में अखबारों के जरिये मिलने वाली प्रामाणिक जानकारी उनकी सकारात्मक सोच को विकसित करेगी। बच्चों की पढ़ने की यह आदत तब और विकसित होगी, जब अभिभावक भी बच्चों को घर में पढ़ने के लिये प्रोत्साहित करेंगे। यहां यह भी जरूरी है कि बच्चों के लिये स्कूलों में शुरू हुआ यह अभियान निरंतरता के साथ चलता रहे।

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