देश की आजादी का संबंध जितना व्यवस्था के स्वास्थ्य से है, उतना ही उसके नागरिकों के स्वस्थ होने से भी। जैसे स्वस्थ शरीर में स्वस्थ आत्मा निवास करती है, ऐसे ही स्वस्थ नागरिकों पर देश का स्वास्थ्य निर्भर करता है। हर साल देश में सरकारों को अरबों रुपये लोगों के रोगों के उपचार हेतु खर्च करने पड़ते हैं। इस धन को विकास कार्यों पर भी लगाया जा सकता था। यूं तो व्यक्ति किसी महामारी, आनुवंंशिक या किसी जेनेटिक रोग का शिकार हो सकता है, लेकिन आम तौर व्यक्ति स्वस्थ ही जन्म लेता है। लेकिन कहीं न कहीं सेहत के प्रति उदासीनता, आलस्य व प्रमाद के चलते व्यक्ति अस्वस्थ होता है। दरअसल, जीवन शैली की जटिलताओं के चलते ही हमारे रोगों का दायर बढ़ता जा रहा है। चिंता की बात यह है कि आज देश मधुमेह व हाइपरटेंशन की राजधानी बनता जा रहा है। सवाल यह है कि तमाम चिकित्सा अनुसंधान, शोध व नई-नई तकनीकों के ईजाद होने के बाद रोगों का सिलसिला थम क्यों नहीं रहा है? आज देश में एम्स व पीजीआईएमआर जैसे अनेक प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थानों, मेडिकल कालेजों और पांच सितारा अस्पतालों के बावजूद रोगियों का आंकड़ा दिन-दूनी रात चौगुनी गति से क्यों बढ़ता जा रहा है? लगातार बढ़ती मेडिकल स्टोरों की संख्या के बावजूद रोगियों की लाइन लंबी क्यों होती जा रही है? दरअसल, हमें जो सेहत बनाने की आजादी मिली है, हम उसका अतिक्रमण करते हैं। हमारे खानपान की अराजकता भी रोगों का कारण बनती है। हमारी नकारात्मक सोच हमारी बीमारी का कारण बनती है। हमारे असमय खान-पान की निरंकुश आजादी रोगों का कारण बनती है। हमारा विलासिता का जीवन रोगों को पालता है। भूख से ज्यादा खाना रोगों को जन्म देता है। हमारा असमय खाना रोगवर्धक है। नई पीढ़ी द्वारा हमें विरासत में मिली खान-पान की कला की अनदेखी, हमें बीमारियों की तरफ धकेलती है। परंपरागत भोजन की उपेक्षा हमें रुग्ण बनाती है।
हमने खानपान-जीवन शैली में पश्चिम की नकल तो खूब की है, लेकिन फिजिकल फिटनेस के उनके जुनून को अनदेखा कर दिया। हम लगातार शरीर के संकेतों की अनदेखी करके उसे रोगों की गुलामी की तरफ धकेल देते हैं। युवा अवस्था में तो हमारा शरीर खानपान की अराजकता झेल लेता है, लेकिन जैसे व्यक्ति पचास की उम्र पार करता है, उसकी डाइनिंग टेबल पर मेडिकल स्टोर खुल जाता है। बी.पी. की दवाई, शूगर की दवाई, जोड़ों के दर्द की दवाई, और तो और पाचन दुरुस्त करने की दवाइयां। चंडीगढ़ जैसे शहर में, जो अपने खूबसूरत पार्कों के लिये जाना जाता है, गिनती के लोग ही सुबह सैर करते नजर आते हैं। योग की कक्षाओं में गिने-चुने चेहरे दिखते हैं। लोग सुबह सैर व योग के समय नींद की गुलामी कर रहे होते हैं। ऐसा नहीं है कि सभी लोग देर रात आफिस व काम-धंधों से लौटते हैं। पहले देर रात तक टीवी की गुलामी होती थी और अब देर रात तक मोबाइल की गुलामी करते हैं। मोबाइल की स्क्रीन को स्क्रॉल करते-करते रात हो जाती है तो फिर सुबह नींद कहां खुलेगी? प्राकृतिक चिकित्सा कहती है कि हम सूरज को उठायें, न कि सूरज हमें उठाये। भारतीय दर्शन में ब्रह्ममुहूर्त में उठने की परंपरा है। इसका मतलब चार बजे उठना नहीं है। मतलब, सूरज उगने से एक-डेढ़ घंटे पहले हम उठ जाएं। दरअसल, इस समय शरीर में वात की सक्रियता से अपशिष्ट पदार्थ स्वत: ही बाहर निकलने को तैयार होते हैं। व्यक्ति को कब्ज नहीं होती। इस समय वायु शुद्ध होती है। यह आध्यात्मिक साधना का भी समय होता है। दिनभर हमारे शरीर में ताजगी बनाये रखता है। दरअसल, हमें सूर्य के चक्र के साथ उठना और भोजन करना चाहिए। इसी हिसाब से हमारी जठराग्नि सक्रिय होती है। निस्संदेह, आजादी के बाद हर किसी के जीवन में समृद्धि आई है, हमारा खान-पान समृद्ध हुआ, लेकिन उसी अनुपात में शारीरिक श्रम कम हुआ है। खेत में काम करने वाले किसान व श्रमिक को कोई टहलने व व्यायाम करने को नहीं कहता, क्योंकि उनकी दिनचर्या में श्रम है। सेहत की आजादी के लिये हमें उदासीनता-लापरवाही जैसी गुलामी की बेड़ियां तोड़नी ही पड़ेंगी।

