मुफ्त की घातक राजनीति

वित्तीय अनुशासन व नैतिकता का प्रश्न

मुफ्त की घातक राजनीति

वाकई ‘मुफ्त का चंदन घिस रघुनंदन’ की राजनीति से राजकोषीय अनुशासन को भंग करने वाले दलों की करतूतें हद पार कर गई हैं। तभी पहले प्रधानमंत्री ने रेवड़ियां बटोरने की संस्कृति को घातक बताया और अब सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जतायी है। कोर्ट ने केंद्र सरकार से सख्ती से कहा है कि विवेकहीन फ्रीबीज़ पर वह अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करे। इस बाबत वित्त आयोग से जानकारी लेकर कोर्ट को सूचित करे। निस्संदेह, यह स्थिति की गंभीरता को ही दर्शाता है। यह टकसाली सत्य है कि मुफ्त में मिली चीज की हमें बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। इससे दशकों से स्थापित सार्वजनिक व्यवस्था चरमरा जाती है। इतिहास गवाह है कि ऋण माफ करने की राजनीतिक कलाबाजी से तमाम सहकारी व सरकारी बैंक चरमराये हैं। मुफ्त बिजली व पानी करने से ये सुविधाएं उपलब्ध कराने वाले संस्थान कर्ज में डूब गये हैं। यही नहीं, मुफ्त की सुविधाओं के लिये धन देने से दीर्घकालीन संरचनात्मक विकास के लक्ष्य अधूरे रह जाते हैं। दरअसल, मुफ्त के लालच से वोट बटोरने का फार्मूला दशकों पुराना है। लेकिन हाल के दिनों में यह चरम पर जा पहुंचा है। दीर्घकालीन विकास की तार्किकता को स्थापित करने में विफल राजनेता मुफ्त के प्रलोभन का शॉर्टकट रास्ता अपना रहे हैं। ऐसे में वे राजनीतिक दल, जो वित्तीय अनुशासन के साथ दीर्घकालीन विकास के मुद्दे लेकर चुनाव मैदान में आते हैं, जनादेश हासिल करने में विफल रह जाते हैं। अक्सर देखा जाता है कई योग्य व प्रतिभावान प्रत्याशी प्रलोभन की राजनीति का शिकार हो जाते हैं। कभी तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता ने मुफ्त की राजनीति को बड़े पैमाने पर शुरू किया था। लेकिन आज तो यह राजनीतिक फैशन बन गया है। मिक्सर ग्राइंडर, साड़ी, अनाज, साइकिल से शुरू हुआ यह प्रलोभन का राजनीतिक खेल अब लेपटॉप, स्कूटी से लेकर फ्री बिजली-पानी तक जा पहुंचा है। चुनाव से पहले घोषणापत्रों में मुफ्त का स्वर्ग धरती पर उतारने का उद्घोष होता है।

यद्यपि यह बड़ा सवाल यह है कि क्या कानून बनाने वालों को कानून बनाकर मुफ्त की राजनीति करने से रोका जा सकता है? क्या ये प्रयास राजनेताओं में वह नैतिकता जगा पायेंगे जो उन्हें ऐसा करने से रोके? अन्य चुनावी विसंगतियों को रोकने के लिये बने कानूनों के छिद्र क्या इस मामले में भी तलाश लिये जाएंगे? क्या भ्रष्टाचार आदि कुप्रवृत्तियों आदि पर रोक लगाने के लिये बने कानूनों के निष्प्रभावी होने जैसा हश्र इस प्रयास का भी होगा? लेकिन इसके बावजूद शीर्ष अदालत की सक्रियता से उम्मीद जगी है कि इस दिशा में कोई निर्णायक पहल होगी। कोर्ट ने चुनाव आयोग की भूमिका पर भी टिप्पणी की है- ‘यदि मुफ्त के उपहारों के जरिये मतदाताओं को रिश्वत देने के मामले में भारत का चुनाव आयोग केवल मजबूरी में हाथ ही मल सकता है तो तब भगवान ही इसका रखवाला है।’ साथ ही कोर्ट ने कहा कि केंद्र सुनिश्चित करे कि राजनीतिक दल अव्यावहारिक वायदे न करें। निस्संदेह, हमारे देश के मतदाताओं को भी प्रलोभनों की राजनीति को नकारना होगा। यह विडंबना ही है कि आजादी का अमृत महोत्सव मनाते देश में हम सात दशक बाद भी आम मतदाताओं में वह विवेक जगाने में विफल रहे हैं जो प्रलोभनों की राजनीति को नकार सके। कैसे हम चंद रुपयों के उपहार के लिये अपना कीमती वोट दांव पर लगा देते हैं। माना कि देश में आर्थिक विसंगतियां है लेकिन हमारा राष्ट्रीय चरित्र भी ऊंचे दर्जे का होना चाहिए। हमें लोकतंत्र की मर्यादाओं की गरिमा का ख्याल रखना चाहिए। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मुफ्त की सुविधा की बड़ी कीमत चुकानी होती है। वह धन सरकारी खजाने से आता है और इसके लिये जो टैक्स देना होता है, उसे अमीर-गरीब को चुकाना होता है। हमें प्रलोभन की राजनीति से कंगाल हुए देशों का उदाहरण देखना चाहिए। ताजा कड़ी में श्रीलंका हश्र देखें। निस्संदेह, वित्त आयोग को कर्ज में डूबे राज्यों में मुफ्त की राजनीति करने वालों पर नकेल कसनी चाहिए। साथ ही इस बाबत विस्तृत छानबीन करके रिपोर्ट शीर्ष अदालत को देनी चाहिए।

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