Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
Add Tribune As Your Trusted Source
search-icon-img
Advertisement

उम्मीद से ज्यादा तेज़ी

जीडीपी में मज़बूत बढ़ोतरी से आत्ममुग्ध न हों

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
Advertisement

ऐसे वक्त में जब अमेरिका-ईरान युद्ध से कच्चे तेल के दामों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई और आपूर्ति शृंखला बाधित रही, देश की अर्थव्यवस्था में मजबूती का संकेत सुखद ही कहा जायेगा। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद दर 7.8 रही है। यह प्रदर्शन केंद्रीय बैंक आरबीआई के सात फीसदी की विकास दर के अनुमान से भी अधिक है। यह दर बाजार की उम्मीदों से भी अधिक है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, ऊर्जा बाजार में उतार-चढ़ाव और ग्लोबल अनिश्चितता के बावजूद देश सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में शुमार है। दरअसल, इस तेज विकास दर को पाने हेतु विभिन्न क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन से मदद मिली है। वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में सेवा क्षेत्र में दस फीसदी की विकास दर उत्साहजनक रही है। विनिर्माण क्षेत्र में 9.2 तथा निर्माण क्षेत्र में विकास दर 7.7 फीसदी की वृद्धि ने देश की आर्थिकी को गति दी है। दरअसल,औद्योगिक विकास ने भी सकल विकास दर को संबल दिया । इससे भारतीय घरेलू अर्थव्यवस्था के महत्व का पता चलता है। उल्लेखनीय है इस दौरान देश में उपभोक्ता मांग अच्छी बनी रही। वास्तव में देश के बड़े उपभोक्ता बाजार ने वैश्विक मांग और व्यापार में आई शिथिलता के बावजूद स्वदेशी आर्थिकी को मजबूती दी है। भले ही देश का विपक्ष इस कामयाबी को आंकड़ों की बाजीगरी बता रहा है लेकिन सरकार इस उपलब्धि पर अपनी पीठ थपथपा सकती है। लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि वैश्विक स्तर पर जारी अस्थिरता के चलते भविष्य में पैदा होने वाले जोखिम कम नहीं हो जाते हैं। विकास दर के इन आंकड़ों के चलते हमें लापरवाह होने से बचना चाहिए। पूंजीगत सामान के ज्यादा उत्पादन व सरकारी पूंजीगत व्यय में वृद्धि से पता चलता है कि देश में संरचनात्मक विकास व निवेश की मांग बनी हुई है।

वास्तव में देश के नीति-नियंताओं को हमारी खाद्य शृंखला को मजबूती देने वाले और महंगाई को प्रभावित करने वाले कृषि उत्पादन में तेजी लाने की जरूरत है। ग्लोबल वार्मिंग के प्रभावों के बीच इस बार देश के विभिन्न क्षेत्रों में हुई असमान बारिश का असर भी कृषि उत्पादन पर पड़ सकता है। देश का कृषि क्षेत्र अभी भी मौसम की मार के प्रति संवेदनशील बना हुआ है। बहरहाल, पहली तिमाही के उत्साहवर्धक आंकड़े देश की वार्षिक विकास की अनुमानित दर में संशोधन करने की जरूरत को बताते हैं। यदि देश में घरेलू मांग और निवेश मजबूत बने रहते हैं तो हमें भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा वार्षिक विकास दर का 6.7 फीसदी का अनुमान कम लग सकता है। इसके बावजूद, एक अच्छे तिमाही नतीजों का मतलब यह नहीं है कि आसन्न जोखिम से पूरी तरह बचा जा सकता है। ध्यान रहे कि 7.8 फीसदी की विकास दर पिछली तिमाही की 8.6 फीसदी की वृद्धि दर के मुकाबले थोड़ा कम है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में जारी अनिश्चितताएं अभी बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। वैश्विक कारोबारी तनाव, भू-राजनीतिक टकराव और ऊर्जा आपूर्ति में लगातार जारी संभावित बाधाओं से हमारा लागत मूल्य बढ़ सकता है। जिससे देश के निर्यातों में वृद्धि की संभावनाएं कमजोर हो सकती हैं। भारत जैसे देश के लिये कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है, जो अपने अधिकांश ऊर्जा संसाधनों का आयात करता है। जरूरी यह भी है कि देश की विकास दर में दर्शाई जा रही तेजी का अहसास आम आदमी की जिंदगी में भी दिखायी दे। देश की आंतरिक स्थितियों पर भी ध्यान देना जरूरी है। विकास दर वृद्धि के सम्मोहन में देश में महंगाई और बेरोजगारी की समस्या की अनदेखी नहीं की जा सकती। बहरहाल, जहां सरकार विकास दर को सुधारों का प्रतिफल बता रही है, वहीं विपक्ष जीडीपी के अनुमानों के तरीकों पर सवाल उठा रहा है। ऐसी जांच-पड़ताल व बहस ठोस सबूतों पर आधारित होनी चाहिए। बहरहाल, सरकार को विकास दर के आंकड़ों से आत्ममुग्ध नहीं होना चाहिए। जरूरत इस बात की है कि विकास के आंकड़ों को व्यापक विकास में बदला जाए। जिससे सही मायने में रोजगार बढ़े, लोगों की आमदानी बढ़े और हम आसन्न वैश्विक संकटों का मुकाबला करने में सक्षम हों।

Advertisement

Advertisement
Advertisement
×