यह विडंबना ही है कि 21वीं सदी, जिसे ज्ञान की सदी भी कहा जाता है, में किसी व्यक्ति के धार्मिक स्थल विशेष जाने पर वर्ग या लिंगभेद के आधार पर रोक लगे। इस बाबत सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी से सहमत हुआ जा सकता है जिसमें कहा गया कि मंदिरों व मठों में प्रवेश में भेदभाव धर्म के लिये अच्छा नहीं है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने धार्मिक स्थलों में महिलाओं से भेदभाव के मामले में सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की थी। देश की शीर्ष अदालत का मानना था कि मंदिरों और मठों में जाने का अधिकार हर व्यक्ति को मिलना चाहिए। अदालत ने चिंता जतायी कि यदि ऐसा नहीं होता है तो समाज में विभाजन को बढ़ावा मिलेगा। जिसका धर्म विशेष की सर्वस्वीकार्यता पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा। दरअसल, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ धार्मिक स्थलों में महिलाओं से भेदभाव के मामले में सात कानूनी सवालों पर विचार कर रही है। जिसमें केरल के बहुचर्चित सबरीमाला मंदिर में दस से पचास साल की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध का मुद्दा भी शामिल है। दरअसल, केरल के कई संगठनों की ओर से शीर्ष अदालत में उपस्थित अधिवक्ता ने दलील दी थी कि संप्रदाय विशेष का मंदिर, इस मामले में प्रवेश की अनुमति और पूजापाठ की इजाजत एक संप्रदाय विशेष तक सीमित रख सकता है। इस प्रसंग में पीठ की न्यायाधीश बीवी नागरत्ना ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को मंदिर और मठ में प्रवेश का अधिकार मिलना चाहिए। किसी को रोका जाना हिंदू धर्म के लिए अच्छी परंपरा नहीं है। दूसरे शब्दों में इसका धर्म पर बुरा असर नहीं पड़ना चाहिए। निश्चित रूप से देशकाल व परिस्थितियों के अनुसार देश के कानून व संविधान में भी परिवर्तन किए गए हैं। ऐसा में आस्था स्थलों से जुड़ी मान्यताओं व परंपराओं पर भी तर्कशील ढंग से विचार किया जाना जरूरी है। यह किसी भी समाज में समतामूलक सोच के विस्तार के लिये अपरिहार्य शर्त होनी चाहिए। इस दिशा में उदार सोच समय की जरूरत है।
इसमें दो राय नहीं कि हमारे धार्मिक स्थल हमारी आध्यात्मिक दृष्टि को समृद्ध करने में अहम भूमिका निभाते हैं। धार्मिक होने का मतलब है ममता-समता और लोककल्याण से जुड़ी व्यापक दृष्टि का होना। श्रद्धालु किसी भी धार्मिक स्थल में मन की शांति और सुकून के लिये जाते हैं। इस बात से सहमत नहीं हुआ जा सकता है कि पूजा पद्धति व धार्मिक स्थल में प्रवेश रोकने पर हमारे आराध्य प्रसन्न होंगे। पौराणिक प्रसंगों में ऐसे उदाहरण नहीं मिलते हैं जब धरती पर अवतार लेने वाले देवताओं ने किसी वंचित समाज के व्यक्ति और महिलाओं को लेकर किसी तरह के भेदभाव को प्रश्रय दिया हो। छोटा-बड़ा, अमीर-गरीब व महिला व पुरुष का भेद कभी उनके कालखंड में सामने नहीं आया। इसके बावजूद देशकाल परिस्थितियों में तथा तार्किकता के अभाव में यदि किसी तरह भेदभाव कतिपय कारणों से सामने आया भी हो, तो वक्त का तकाजा यही है कि उन्हें समय के अनुकूल ढाला जाए। आस्था के नजरिये से बात करें तो भी ईश्वर ने अपनी किसी भी रचना को लेकर कभी किसी तरह का भेदभाव नहीं किया। तो फिर उसके रचे इंसानों को किसी तरह के भेदभाव की अनुमति कैसे दी जा सकती थी। बहुत संभव है कि किसी समय में शुचिता को लेकर परंपरागत सोच रही हो। लेकिन आज विज्ञान ने कई प्राचीन धारणाओं व रूढ़ियों को बदलकर नई दृष्टि दी है। चंद्रमा हजारों साल से मानवीय आस्था का प्रतीक रहा है। हिंदू, मुस्लिम व अन्य धर्म किसी न किसी रूप में चंद्रमा को गहन आस्था के केंद्र के रूप में देखते रहे हैं। 19वीं सदी में कौन सोच सकता है कि तमाम धर्मों में पूज्य चांद पर कभी इंसान भी कदम रख सकता है। लेकिन आज यह हकीकत है कि भारत समेत कई विकसित देशों के मिशन चंद्रमा की सतह पर उतरे हैं। बहरहाल, ऐसे में उस धर्म विशेष की सर्वस्वीकार्यता को लेकर सवाल खड़े हो सकते हैं, जो व्यक्ति, वर्ग, संप्रदाय व लिंग के आधार पर किसी भी तरह का भेद करता हो। जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि ऐसे निर्णयों का धर्म पर नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए।

