इसमें दो राय नहीं कि पिछले एक दशक में यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी यूपीआई देश में लेन-देन के एक लोकप्रिय और विश्वसनीय माध्यम के रूप में स्थापित हुआ है। इससे भी बढ़कर भारत की निरंतर डिजिटल होती अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ भी बना है। हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा जारी अध्यादेश में दो हजार रुपये से अधिक के लेन-देन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर चार्जेज कारोबारियों के ऊपर लगाने की बात कही गई है। इस घोषणा ने सरल-सुलभ लेन-देन करने वाले करोड़ों उपभोक्ताओं के मन में कई सवालों को जन्म दिया है। हालांकि, राहतकारी यह है कि नोटिफिकेशन में दो हजार तक के यूपीआई लेन-देन और रुपे डेबिट कार्ड पेमेंट्स पर कोई शुल्क न लगाने की बात कही गई है। लेकिन इससे देश में अधिक मूल्य वाले यूपीआई लेन-देन पर एमडीआर चार्जेज लगाने का रास्ता खुल गया है। बैंकों, सेवा प्रदाता संस्थाओं व विभिन्न एसोसिएशनों के प्रतिनिधि जल्द ही दो हजार रुपये से अधिक के यूपीआई लेन-देन पर शुल्क निर्धारण करेंगे। निस्संदेह किसी भी बेहतर सुविधा के लिए उपभोक्ता की भी आर्थिक जवाबदेही बनती है। उल्लेखनीय है कि साल 2016-17 में महज 0.07 लाख करोड़ रुपये के लेन-देन मूल्य से यूपीआई के जरिये 314 लाख करोड़ रुपये का ट्रांजेक्शन हुआ। वैसे आम उपभोक्ता पर सीधे तौर पर एमडीआर लगने का प्रभाव नहीं पड़ेगा क्योंकि देश में 96 फीसदी लेन-देन दो हजार रुपये की सीमा में ही आता है। लेकिन यदि कारोबारियों पर दो हजार से अधिक के यूपीआई लेन-देन पर एमडीआर शुल्क लगता है तो येन-केन-प्रकारेण वे इसका बोझ उपभोक्ताओं पर डालने का ही प्रयास करेंगे। वास्तव में आज जब साइबर फ्रॉड के मामलों में लगातार अप्रत्याशित तेजी आ रही है तो हर रोज होने वाले करोड़ों डिजिटल भुगतानों की सुरक्षा करना भी जरूरी हो जाता है। विशेषकर, छोटे विक्रेताओं और आम उपभोक्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए।
निस्संदेह, सरकार का यह तर्क वाजिब है कि इतने बड़े इकोसिस्टम को हमेशा सरकारी अनुदान के भरोसे नहीं चलाया जा सकता है। यह भी हकीकत है कि सरकार को यूपीआई लेन-देन पर एमडीआर लागू इसलिये करना पड़ा क्योंकि यूपीआई नेटवर्क चलाने के लिए हर साल बीस हजार करोड़ का बोझ उसे वहन करना पड़ता है। पहले सरकार ने डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देने के लिए ग्राहक व पेमेंट लेने वाले व्यापारियों पर कोई फीस नहीं लगायी थी। लेकिन यूपीआई नेटवर्क के विस्तार के साथ इसे चलाने का खर्च भी लगातार बढ़ता चला गया। यूपीआई का कितनी तेजी से विस्तार हुआ, इस बात का पता इस आंकड़े से चलता है कि वर्ष 2026 के वित्तीय वर्ष में यूपीआई के जरिये हुए 24,161. 69 करोड़ लेन-देन 314 लाख करोड़ रुपये कीमत के हुए। इस बीच यूपीआई से जुड़े बैंकों की संख्या 44 से बढ़कर 703 हो गई है। देश में करीब 55 करोड़ लोग यूपीआई का उपयोग कर रहे हैं। निर्विवाद रूप से आज के दौर में साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी रोकने, इंफ्रास्ट्रक्चर और नवाचार के लिए लगातार नये निवेश करने की जरूरत होती है। ऐसे में दो हजार से अधिक मूल्य के व्यापारिक लेन-देन पर सीमित मात्रा में एमडीआर मॉडल बैंकों और भुगतान प्रदाताओं के लिए एक स्थायी राजस्व का तंत्र विकसित कर सकता है। वैसे हकीकत यह भी है कि भले ही सरकार एमडीआर सिर्फ व्यापारियों पर ही लागू कर रही है, लेकिन लागत बढ़ने पर व्यवसायी एमडीआर का कुछ हिस्से का बोझ मूल्य बढ़ोतरी के माध्यम से उपभोक्ताओं पर डाल देंगे। ऐसे में यूपीआई और सेवा नियामक कमेटी को स्पष्टता और पारदर्शिता के आधार पर फैसला लेना चाहिए। एमडीआर की राशि का निर्धारण कुछ इस तरह किया जाना चाहिए, जिससे छोटे व्यवसायियों पर अधिक दबाव न पड़े। लोगों का आपसी लेन-देन मुफ्त ही बना रहे और साथ ही दो हजार रुपये की सीमा में बदलाव न किया जाए। आज देश में यूपीआई व्यवस्था त्वरित, सस्ती और सार्वभौमिक भुगतान सुविधा के चलते अर्थव्यवस्था की एक बड़ी ताकत बन गयी है। ऐसे में सरकार को ऐसा मॉडल तैयार करना चाहिए, जो डिजिटल पेमेंट को जनसाधारण के लिए सहज व सुलभ रखे। साथ ही उस ढांचे को आर्थिक संबल दे जिस पर यह निर्भर है।

