आंदोलन के विकल्प तलाशें

ताकि जनता को न हो परेशानी

आंदोलन के विकल्प तलाशें

फाइल फोटो

देश में लंबे चले किसान आंदोलन के बाद तीन विवादास्पद कृषि कानूनों की वापसी हुई थी। तब माना जा रहा था कि आंदोलन का पटाक्षेप हो गया है। रविवार को फिर पंजाब व हरियाणा में किसान रेल की पटरियों व टोल प्लाजों पर डटे। आरोप था कि केंद्र सरकार ने वायदा खिलाफी की है। एमएसपी को कानूनी दर्जा देने के बाबत केंद्र सरकार ने जो कमेटी बनायी है उसमें किसानों काे न्यायसंगत प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है। किसान हरियाणा व पंजाब में कई रेल ट्रैकों पर धरने पर बैठे जिसके चलते बड़ी संख्या में ट्रेनें रद्द की गईं और उनके रूट बदले गये। निस्संदेह, किसानों को अपनी जायज मांगों के लिये आंदोलन करने का अधिकार है। लेकिन सवाल उठता है कि इसके लिये हजारों यात्रियों को क्यों परेशान किया जाये? लोग तमाम जरूरी कार्यों के लिये घर से निकलते हैं। कई नौकरी, उपचार व अन्य जरूरी कार्यों के लिये रेल से सफर करते हैं। लेकिन ऐसे आंदोलन से उनकी मुसीबतों में भारी इजाफा हो जाता है। ऐसे ही जम्मू जाने वाले देश के विभिन्न राज्यों के तीर्थयात्रियों को भी भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। उन्हें मनमाना किराया वसूलने वाली निजी बसों व टैक्सी संचालकों के लालच का शिकार होना पड़ता है। इसका शिकार गंभीर रोगों का उपचार कराने जाने वाले यात्री भी होते हैं। निस्संदेह, किसी भी आंदोलनकारी को देश के व्यापक हितों का भी ध्यान रखना चाहिए। पहले ही महंगाई व बेरोजगारी से जूझते लाखों लोगों की जीविका ऐसे आंदोलनों से प्रभावित होती है। वहीं आम नागरिकों को सबसे सस्ती यात्रा उपलब्ध कराने वाली भारतीय रेल की आर्थिकी पर भी इसका प्रतिकूल असर पड़ता है। काश, हम जापान आदि राष्ट्रवादी देशों से सबक लेते जो देश में अपना विरोध दर्ज कराने के लिये उत्पादन बढ़ाकर अपनी सरकार को मुश्किल में डाल देते हैं। निस्संदेह, अपनी जायज मांगों को लेकर विरोध करने के अधिकार हमें लोकतांत्रिक व्यवस्था देती है, लेकिन उसकी सार्थकता बनाये रखना हमारा दायित्व है।

इसमें दो राय नहीं कि ऐसे मामलों में सत्ताधीशों की उदासीनता की भी बड़ी भूमिका रहती है। क्यों सरकारें समय रहते संवेदनशील ढंग से किसी वर्ग या संगठन की मांगों पर विचार नहीं करतीं? किसानों का आरोप है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी देने वाला कानून बनाने को लेकर सरकार ढुलमुल रवैया अपना रही है। उनका आरोप है कि इस बाबत केंद्र सरकार ने जो कमेटी बनायी है उसमें सरकार द्वारा अपनी मनपसंद के लोगों को स्थान दिया गया है। किसान लंबे समय से स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशों को लागू करने की मांग करते रहे हैं, लेकिन देश में किसी भी सरकार ने इसे लागू करने की दिशा में ईमानदार पहल नहीं की। मौजूदा समय में कोरोना संकट और यूक्रेन युद्ध के चलते देश में जो महंगाई बढ़ी है उसने किसान की लागत को भी बढ़ाया है। यह एक हकीकत है कि कोरोना की पहली लहर के दौरान लगे सख्त लॉकडाउन के बाद जब भारतीय अर्थव्यवस्था ढलान पर थी तो केवल कृषि क्षेत्र ने अर्थव्यवस्था को संबल दिया। इतना ही नहीं, कोरोना संकट के दौरान जिन अस्सी करोड़ लोगों को सरकार मुफ्त अनाज देने का ढोल पीटती रही है वह भारतीय किसान की मेहनत का ही फल है। ऐसे में केंद्र सरकार को किसानों की वास्तविक समस्याओं पर उपलब्ध संसाधनों के दायरे में संवेदनशील ढंग से विचार करना चाहिए। ऐसी नौबत क्यों आती है जब अपनी मांगों को लेकर कोई संगठन या वर्ग सड़कों पर उतर आता है तब सरकारों की नींद खुलती है। इसके चलते आम नागरिकों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। साथ ही देश की अर्थव्यवस्था पर भी इन आंदोलनों का प्रतिकूल असर पड़ता है। निस्संदेह, आंदोलनकारियों को भी आंदोलन के वैकल्पिक रास्ते पर विचार करना चाहिए जिसमें वे सरकारों पर तो दबाव बनायें मगर सार्वजनिक जन-जीवन बाधित न हो। ऐसी बाधाओं का देश की अर्थव्यवस्था व नागरिक जीवन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। विषम वैश्विक परिस्थितियों में ऐसा करना और जरूरी हो जाता है।

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