उम्मीदों के रुझान

देश में आबादी के स्थिर होने के संकेत

उम्मीदों के रुझान

कभी नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने देश में महिलाओं की कम आबादी पर चिंता जताते हुए–‘मिसिंग वुमन’ शब्द का प्रयोग किया था। लेकिन आज देश में उनकी स्थिति में सकारात्मक बदलाव हुआ है। नेशनल फैमिली एंड हेल्थ सर्वे के निष्कर्ष तो कम से कम यही संकेत दे रहे हैं कि देश में पहली बार महिलाओं की संख्या पुरुषों से ज्यादा हो गई है। वर्ष 1990 में देश के 1000 पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या 927 थी। वर्ष 2005-2006 में यह आंकड़ा बराबर हजार-हजार तक जा पहुंचा। वहीं वर्ष 2015-16 में यह घटकर 991 हो गया था। लेकिन इस बार महिलाएं पुरुषों से अधिक हो गई हैं। देश में हजार पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या 1020 हो गई है। इसकी एक वजह पुरुषों की जीवन प्रत्याशा के मुकाबले महिलाओं की जीवन प्रत्याशा दर अधिक होना है। इस विरोधाभास के बावजूद कि देश की आधी से अधिक महिलाओं व बच्चों में खून की कमी पायी गई है। इस सर्वे का जो दूसरा महत्वपूर्ण निष्कर्ष है, वह यह कि देश में प्रजनन दर में गिरावट आई है जो 2016 के 2.2 के मुकाबले अब सिर्फ 2 रह गयी है जो अंतर्राष्ट्रीय मानक प्रतिशत से भी कम है। इसका निष्कर्ष यह भी है कि ‘घर में दो बच्चे ही अच्छे’ के मंत्र को लोगों ने अपनाने का मन बना लिया है। सर्वे के अनुसार अब औसतन एक महिला के दो ही बच्चे हैं। जो इस बात का भी प्रमाण है कि देश में जागरूकता आई है और लोगों ने संतति निग्रह के उपायों का उपयोग करना शुरू किया है। जिसका एक मायने यह भी है कि हमारे देश में जनसंख्या स्थिरता की ओर बढ़ रही है। निस्संदेह राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के कई निष्कर्ष आने वाले भविष्य के लिये उम्मीद जगाने वाले हैं जो बताते हैं कि देश में शिक्षा व अन्य कारणों से जागरूकता आई है, लोग ‘छोटा परिवार, सुखी परिवार’ के मंत्र को तरजीह देने लगे हैं।

निस्संदेह, हालिया सर्वे में प्रजनन दर में गिरावट के रुझान से यह भी समझा जा सकता है कि देश जनसंख्या के मामले में पीक पर जा पहुंचा है। अभी यह भी विचारणीय प्रश्न है कि प्रजनन दर में गिरावट से क्या देश की आबादी घट रही है। बहरहाल, इस बाबत अंतिम निष्कर्ष नयी जनगणना के बाद ही सामने आ सकेगा। यद्यपि देश के सामने लिंग अनुपात में असमानता की चुनौती बनी हुई है। लोगों में लड़के की चाहत कम नहीं हुई है। हालांकि, सख्ती के चलते लिंग जांच की प्रवृत्ति पर अंकुश जरूर लगा है। वहीं एक हकीकत यह भी है कि जीवन प्रत्याशा में वृद्धि के चलते महिलाएं पुरुषों के मुकाबले अधिक जी रही हैं। लेकिन यह हमारी चिंता का विषय होना चाहिए कि देश के चौदह राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों में हुए सर्वे में आधी से अधिक महिलाएं व बच्चे रक्ताल्पतता के शिकार हैं। दरअसल, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण दो चरणों में, वर्ष 2019 व 2021 में किया गया। इसमें देश के 707 जिलों के साढ़े छह लाख घरों को शामिल किया गया। दूसरे चरण के सर्वे में अरुणाचल प्रदेश, चंडीगढ़, छत्तीसगढ़, हरियाणा, झारखंड, मध्य प्रदेश, दिल्ली, ओडिशा, पुड्डुचेरी, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड जैसे राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों को शामिल किया गया था। नीति आयोग के सदस्य डॉ. विनोद पॉल व केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण सचिव राजेश भूषण ने देश के चौदह राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों हेतु जनसंख्या, प्रजनन, बाल स्वास्थ्य, परिवार कल्याण, पोषण आदि से जुड़े आंकड़े जारी किये हैं। इन आंकड़ों में बच्चों के पोषण में मामूली सुधार देखा गया है। छह माह से कम उम्र के बच्चों को मां का दूध उपलब्ध होने के मामले में अखिल भारतीय स्तर पर सुधार देखा गया है। लेकिन इस स्थिति को सुधारने के लिये व्यापक स्तर पर जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है ताकि वैश्विक संस्थाओं द्वारा जारी रिपोर्ट देश की छवि को प्रभावित न करे। खासकर कुपोषण के मामलों को गंभीरता से लेने की जरूरत महसूस की जा रही है।

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