ऐसे वक्त में जब नीट परीक्षा प्रश्नपत्र लीक होने से उपजे छात्र आक्रोश से देश हाल ही में दो-चार हुआ है, देश के परीक्षा सिस्टम पर प्रतिभागियों का भरोसा कायम करना अपरिहार्य शर्त है। हाल के वर्षों में केंद्रीय स्तर और राज्यों में विभिन्न परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक होने, परीक्षाएं स्थगित होने और परीक्षा परिणामों को लेकर किंतु-परंतु होने की खबरें अक्सर सामने आती रहती हैं। झारखंड लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में अनियमितताओं को लेकर छात्रों का आंदोलन बदस्तूर जारी है। ऐसे में विश्वसनीयता के सवालों से जूझ रही नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी एनटीए का इंटेलिजेंस, कानून लागू करने वाली एजेंसियों तथा डिफेंस फोर्सेज के अनुभवी लोगों को अपने परीक्षा सुरक्षा कमांड सेंटर में शामिल करने का निर्णय एक स्वागत योग्य कदम है। ये प्रयास दूसरी ओर हमें यह भी बताते हैं कि देश में महत्वपूर्ण प्रवेश परीक्षाएं कितनी संवेदनशील व असुरक्षित हो गई हैं। नए प्रावधानों के अनुसार इसके टेस्ट सिक्योरिटी और लाइव ऑपरेशन्स अनुभाग के प्रस्तावित जनरल मैनेजर परीक्षा प्रक्रिया के लगभग हर संवेदनशील हिस्से की देखरेख करेंगे, जिसके अंतर्गत प्रश्नपत्र तैयार करने, एन्क्रिप्शन से लेकर ट्रांसपोर्टेशन, स्टोरेज, वितरण और रियल-टाइम मॉनिटरिंग भी शामिल रहेगा। विश्वास किया जाना चाहिए कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता, बायोमेट्रिक ऑथेंटिकेशन, सीसीटीवी निगरानी और परीक्षा के उपरांत डेटा एनालिसिस से परीक्षा व्यवस्था के पारदर्शी व विश्वसनीय होने की उम्मीद की जा सकती है। निस्संदेह, नीट प्रवेश परीक्षा विवाद के उपरांत प्रतिभागियों में भरोसा कायम करने की दिशा में यह एक गंभीर कोशिश होती नजर आती है। लेकिन एक बात तो तय है कि सिर्फ तकनीक के जरिए सिस्टम की खामियां दूर नहीं की जा सकतीं। हालिया नीट-यूजी पेपर लीक प्रकरण में सीबीआई की जांच में एनटीए के अपने ही गोपनीय विभाग में खामियां पाई गई थीं, मसलन संतोषजनक ढंग से तलाशी न लेना, सीसीटीवी की अपर्याप्त निगरानी, जिम्मेदारियों का सही बंटवारा न होना तथा अंतिम प्रश्न सेट तक बहुत अधिक लोगों की पहुंच होना, जिसने परीक्षा प्रश्नपत्र के लीक संकट को जन्म दिया।
दरअसल, सीबीआई जांच में यह तथ्य भी सामने आया है कि परीक्षा प्रश्नपत्र तैयार करने वाले विशेषज्ञ एक-दूसरे के संपर्क में थे, जिससे परीक्षा की गोपनीयता की सुरक्षा का एक बुनियादी नियम भंग हो गया। वास्तव में, नियमानुसार किसी भी एक व्यक्ति की पहुंच पेपर के सभी फाइनल सेट तक नहीं होनी चाहिए। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि इस कथित गड़बड़ी के लिए किसी हाई-लेवल हैकिंग की जरूरत नहीं पड़ने दी गई। दरअसल, भ्रष्ट लोगों ने परीक्षा प्रक्रिया की मामूली खामियों का फायदा चालाकी से उठाया। निस्संदेह, यह बात किसी भी साइबर खतरे के मुकाबले नीति बनाने वालों के लिए चिंता की बात होनी चाहिए। इसमें दो राय नहीं कि दो सप्ताह पूर्व ही धर्मेंद्र प्रधान की जगह शिक्षा मंत्री बने प्रह्लाद जोशी के कंधों पर एक मजबूत, पारदर्शी और भरोसेमंद परीक्षा सिस्टम बनाने की बड़ी जिम्मेदारी है। उन्हें विषय की संवेदनशीलता को समझते हुए तुरंत विश्वास बहाली के लिए काम आरंभ करना होगा, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि न केवल छात्र, बल्कि उनके अभिभावक व सारा देश फिर से निराश न हो सके। इसी तरह, एनटीए का प्रस्तावित कमांड सेंटर सिर्फ अफसरशाही का एक और विस्तार बनकर नहीं रह जाना चाहिए। वास्तविक अर्थों में इस प्रस्तावित कमांड सेंटर को स्वतंत्र रूप से काम करने का अवसर मिले, स्पष्ट रूप से जवाबदेही तय हो और सुरक्षा में कोई गड़बड़ी पाए जाने पर परीक्षा प्रक्रिया को रोकने का अधिकार मिलना ही चाहिए। निश्चित रूप से देश के लाखों छात्रों के लिए परीक्षा व्यवस्था का निष्पक्ष व पारदर्शी होना ही पहली शर्त है। इसके बावजूद यदि नेशनल टेस्टिंग एजेंसी को कड़ी परीक्षा से गुजरना अनिवार्य ही होगा, तो निस्संदेह, यदि एनटीए उसमें असफल रहता है, तो एजेंसी के भविष्य को लेकर कड़ा फैसला लिया जाना अपरिहार्य ही होगा। इसके अलावा, केंद्र के साथ ही राज्यों में भी प्रवेश परीक्षाएं आयोजित करने वाली एजेंसियों के कामकाज व तौर-तरीकों पर नियमित निगरानी के लिए एक केंद्रीय ढांचा बनाया जाना चाहिए, जो बिना किसी राजनीतिक दबाव के निष्पक्ष व पारदर्शी परीक्षा सिस्टम तैयार करना सुनिश्चित कर सके।

