सबके राम

रामराज की अवधारणा को साकार करें

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निस्संदेह पांच अगस्त भारतीय लोकतंत्र का अविस्मरणीय दिन था। जहां सदियों से प्रतीक्षित इच्छाओं का राष्ट्रीय रूप में प्रकटीकरण हुआ, वहीं न्यायालय द्वारा प्रशस्त मार्ग का अनुकरण हुआ और एक बड़ी आबादी ने उसका सम्मान किया। यही संयम और मर्यादा देशवासियों ने तब भी दर्शायी थी जब सर्वोच्च न्यायालय ने राम जन्मभूमि पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। इसी सोच की ध्वनि राम मंदिर निर्माण के लिये अयोध्या गये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उद‍्बोधन में भी सुनी गई। इसमें दो राय नहीं कि श्रीराम मंदिर हमारी संस्कृति का आधुनिक प्रतीक बनेगा। करोड़ों लोगों के संकल्प व साधना से इस विचार ने मूर्त रूप लिया है। भारतीय संस्कृति में राम अनेकता में एकता के पर्याय रहे हैं। कहीं सगुण रूप में तो कहीं निर्गुण रूप में। तुलसी के राम, कबीर के राम, नानक के राम और महात्मा गांधी के रघुपति राम, इस बात का जिक्र प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में भी किया। यही वजह है कि राममय देश में राम हमारे मन-मंदिर में बसे हुए हैं। गांव-गांव से अयोध्या पहुंची शिलाएं और देश भर के धामों व मंदिरों से लायी गई मिट्टी तथा नदियों-सरोवरों का जल इस बात का प्रतीक है कि इससे पूरे देश का गहरा जुड़ाव है। निस्संदेह अयोध्या में बनने वाला श्रीराम का मंदिर केवल हमारी शाश्वत आस्था का ही प्रतीक नहीं है बल्कि संस्कृति का आधुनिक प्रतीक भी है, जिसके निर्माण के बाद अयोध्या नगरी न केवल अंतर्राष्ट्रीय मानचित्र पर उभरेगी बल्कि क्षेत्र का आर्थिक कायाकल्प भी होगा। पूरा अर्थतंत्र बदलने से रोजगार के तमाम नये अवसर सृजित होंगे। जरूरत इस बात की है कि जिस शांति और मर्यादा से सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को शिरोधार्य किया गया, उसी भावना से मंदिर निर्माण की प्रक्रिया में रचनात्मक भूमिका निभायी जाये। इससे जुड़ी राजनीति का भी अब तो पटाक्षेप होना ही चाहिए। तभी श्रीराम मंदिर के निर्माण की सार्थकता स्थापित हो सकेगी। यही श्रीराम के जीवन के आदर्शों का सार भी है।

भारतीय जनमानस ने श्रीराम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करके दुनिया को बताया है कि देश का आम आदमी जाति, पंथ, धर्म  और राजनीतिक निष्ठाओं से उठकर राष्ट्रीय संदर्भ में सोचता है। भारतीय स्थापत्य कला का अनूठा प्रतीक बनने वाला श्रीराम मंदिर भी पूरी दुनिया को यही सोच दर्शायेगा। देशवासियों के लिये भी एक संदेश कि जीवन पर्यंत श्रीराम ने जिन आदर्शों को जिया है,उनसे प्रेरणा लेकर हम अपना जीवन धन्य करें। एक राजा, पिता, पति और पुत्र के रूप में जिन जीवन के उद्दात मूल्यों का निर्वहन श्रीराम ने किया, मूल्यों के पराभव के दौर में वे हमें जीने की नई राह दिखा सकते हैं। यह भाव करोड़ों लोगों की भागीदारी से बनने वाले मंदिर की प्रक्रिया में भी नजर आना चाहिए। इन मूल्यों से देश का ही नहीं, पूरी मानवता का मार्गदर्शन हो सकता है। सत्ताधीशों का भी दायित्व बनता है कि वे रामराज की अवधारणा को हकीकत में बदलें। सत्ता की प्रवृत्ति सदैव लोककल्याण की अवधारणा को सार्थक करे। निस्संदेह श्रीराम मंदिर का निर्माण महज देवालय की आकांक्षा को ही पूरा नहीं करता बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का प्रकटीकरण भी है, जिससे देश की सांस्कृतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक चेतना जुड़ी है। जिसके चलते आक्रांताओं ने इसे प्रतीकात्मक रूप से निशाना बनाया था। अब श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन तथा न्यायिक प्रक्रिया के दौरान उभरे मतभेदों को मनभेद न बनने दिया जाये। व्यक्ति और देश की शांति हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। सामाजिक समरसता स्वस्थ लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त भी है। आज आवश्यकता इस बात की है कि अतीत की कसक को दरकिनार करके नवनिर्माण को भारतीय जीवन मूल्यों व आदर्शों का पर्याय बनाया जाये। साथ ही सर्वे भवंतु सुखिन: की अवधारणा को भी मूर्त रूप दिया जाये। हमारा प्रयास हो कि अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण से समरस भारत बनने का मार्ग प्रशस्त हो। सही मायनो में राष्ट्र निर्माण का पर्याय बने। हम उन बाधक तत्वों को दूर करने का संकल्प लें जो व्यवहार में रामराज की स्थापना में अड़चन पैदा करते हैं।

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