महामारी से राहत

हरियाणा सरकार की पहल का दोहरा लाभ

महामारी से राहत

देश के अर्थशास्त्री और समाज विज्ञानी लगातार कहते रहे हैं कि कोरोना संकट से हलकान लोगों की मदद और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिये राहत पैकेज दिये जाने की सख्त जरूरत है। पैकेज ऐसा हो कि लोगों के हाथ में पैसा आये। कमजोर वर्ग के लोगों, छोटे दुकानदारों, श्रमिकों आदि को ऐसी मदद से संबल मिलेगा। उनकी खर्च करने की क्षमता बढ़ेगी तो बाजार में मांग बढ़ेगी, जो आर्थिकी को गति देगी। सही मायनो में यही पैकेज ही असल में राहत महसूस करायेगा। इस मुश्किल वक्त में प्रदेशवासियों को राहत देने की दिशा में हरियाणा सरकार ने सार्थक पैकेज की घोषणा कर दी है। सरकार के दूसरे कार्यकाल के छह सौ दिन पूरे होने के मौके पर कुछ ऐसे ही राहतकारी कदमों की घोषणा की गई है। यह राहत पैकेज ग्यारह सौ करोड़ का बताया जा रहा है। इसमें गरीब परिवारों को दी जाने वाली छह सौ करोड़ की राहत भी शामिल है। योजना का लाभ कोरोना महामारी से प्रभावित गरीब परिवारों व दुकानदारों के अतिरिक्त रेहड़ी-फड़ी वालों, रिक्शा-ऑटो चलाने वालों व मजदूरों को मिलेगा। मुख्यमंत्री ने कोरोना व लॉकडाउन से प्रभावित हुए गरीब परिवारों को पांच-पांच हजार रुपये देने का ऐलान किया है। हालांकि, इस बार देश में पिछली बार की तरह सख्त लॉकडाउन तो नहीं लगा, लेकिन महामारी की रोकथाम के नियमों के चलते श्रमिकों व छोटे दुकानदारों पर खासा प्रतिकूल असर देखने में आया है, जिन्हें तुरंत राहत दिये जाने की जरूरत थी। सबसे अच्छी बात यह है कि स्वास्थ्य विभाग के अधीन कार्यरत आशावर्करों के अलावा नेशनल हेल्थ मिशन के बाइस हजार कर्मियों को भी पांच-पांच हजार रुपये की मदद मिलेगी। सरकार का कहना है कि इस योजना पर ग्यारह करोड़ रुपये खर्च होंगे। निस्संदेह आशा वर्कर व स्वास्थ्यकर्मी अपनी जान जोखिम में डालकर जिस जज्बे से कोरोना की लड़ाई में सहभागी रहे हैं, इस घोषणा से उनका मनोबल बढ़ेगा। इस मुश्किल वक्त में अन्य राज्यों को भी ऐसी ही पहल करने की जरूरत है।

निस्संदेह, कोरोना संकट से प्रभावित कमजोर वर्गों व छोटे कामधंधे वाले लोगों को केंद्र सरकार के स्तर पर राहत दिये जाने की सख्त आवश्यकता महसूस की जा रही थी। ये राहत टुकड़ों-टुकड़ों में दिये जाने के बजाय समग्र रूप में दी जाती तो अधिक प्रभावी होती। बेशक इस संकट के चलते केंद्र सरकार के आय के स्रोतों का भी संकुचन हुआ है, लेकिन फिर भी लोगों को तत्काल राहत पहुंचाने की जरूरत है। भय व अवसाद के लंबे दौर के बाद आर्थिक राहत उनका मनोबल बढ़ाने में सहायक होगी। वहीं क्रय शक्ति बढ़ने से बाजार में मांग बढ़ेगी। मांग बढ़ने से उद्योग-धंधों को गति मिलेगी। चलन में मुद्रा का प्रवाह बढ़ने से अर्थव्यवस्था को मंदी से उबरने में मदद मिलेगी। वह भी ऐसे वक्त में जब कोरोना संकट की तीसरी लहर आने की आशंका जतायी जा रही है। हमें तो जान व जहान दोनों का ही ख्याल रखने की जरूरत है। सुरक्षा उपायों व वैक्सीन के कवच के साथ अर्थव्यवस्था को गति देने के प्रयास तेज किये जायें। प्रधानमंत्री घोषणा कर चुके हैं कि गरीबों को मिलने वाला मुफ्त अनाज दिवाली तक मिलता रहेगा। सरकार ने पिछले साल भी ऐसी ही घोषणा की थी, जिसके चलते हम एक बड़ी आबादी को महामारी में भुखमरी के खतरे से बचा सके हैं। केंद्र सरकार ने पहली कोरोना लहर के बाद बीस लाख करोड़ रुपये के राहत पैकेज की घोषणा भी की थी। निस्संदेह इस मुश्किल वक्त में राहत पैकेज जीवन की रोजमर्रा की दिक्कत को कुछ कम करने में मदद तो करते ही हैं। देश में बढ़ती बेरोजगारी की दर के बीच छोटे व्यवसायों को वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराने की जरूरत है ताकि रोजगार के नये अवसर सृजित किये जा सकें। अर्थशास्त्री भी नसीहत दे रहे हैं कि सरकारों को इस वक्त ज्यादा खर्च करना चाहिए, इसके लिये राजकोषीय घाटा बढ़ने की चिंता नहीं करनी चाहिए। कोशिश हो कि निवेश व खपत आधारित मांग में वृद्धि की जाये। इससे अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में मदद मिलेगी।

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