दिल्ली में आयोजित, भारत की महत्वाकांक्षी वैश्विक एआई समिट की शुरुआत में एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी द्वारा विदेशी रोबोट को अपनी खोज बताकर किए दावे ने देश को असहज किया। ग्लोबल साउथ के देशों का नेतृत्व कर रहे भारत की तरक्की को लेकर अकसर मीन-मेख निकालने वाले पश्चिमी मीडिया को ग्रेटर नोएडा स्थित गलगोटिया यूनिवर्सिटी के कृत्य ने नुक्ताचीनी का एक और मौका जरूर दे दिया। जिसको लेकर पश्चिमी मीडिया में खासी चर्चा हुई। यहां एक निष्कर्ष यह भी निकला कि तकनीकी शिक्षा में निजी क्षेत्रों को मौका मिलने का किस हद तक दुरुपयोग भी किया जा सकता है। यह भी कि मौलिक गुणवत्ता से समझौता करके हम देश का कैसा भविष्य तैयार कर रहे हैं। यह घटनाक्रम देश में तेजी से बढ़ती उस नकारात्मक प्रवृत्ति का हश्र भी बताता है, जिसमें आनन-फानन में शॉर्टकट से सफलता की तलाश रहती है। विडंबना यह है कि इस घटना ने वैश्विक एआई सम्मेलन के परिप्रेक्ष्य में कई सवाल पैदा किये। सवाल उठाया कि भारत आज व्यवहार में एआई व रोबोटिक्स के अनुसंधान में कहां खड़ा है? आखिर गलगोटिया यूनिवर्सिटी के नीति-नियंताओं ने यह क्यों नहीं सोचा कि चीन निर्मित एक रोबोट को अपनी उपलब्धि बताने से देश की प्रतिष्ठा को आंच आएगी? अब यूनिवर्सिटी की तरफ से सफाई दी जा रही है कि उसने रोबोट के निर्माण का दावा नहीं किया। वहीं दूसरी ओर उन सरकारी अधिकारियों की भी जवाबदेही तय की जानी चाहिए, जिन्होंने बिना जांच-पड़ताल के विश्वविद्यालय को एआई समिट में स्टॉल लगाने की अनुमति दी। निश्चित रूप से भारत ने पिछले कुछ वर्षों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित तकनीक व रोबोटिक उत्पादन के क्षेत्र में ऊंची छलांग लगाई है। युवा शक्ति के देश भारत ने एआई के क्षेत्र में अमेरिका व चीन के बाद अपना तीसरा स्थान बनाया है। जिसकी पुष्टि अंतर्राष्ट्रीय मानक संस्थाओं ने भी की है। लेकिन एक विरोधाभासी हकीकत यह है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ी आबादी का देश है, जहां श्रम शक्ति प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।
निस्संदेह, ऐसे वक्त में जब कृषि से लेकर चिकित्सा तक और उत्पादन के क्षेत्र में एआई व रोबोटिक्स की दखल बढ़ रही है, प्रचुर श्रमशक्ति की उपलब्धता के बावजूद भारत को समय के साथ कदमताल करनी होगी। हमें एआई व रोबोटिक्स को अपनाना ही होगा। लेकिन सावधानी के साथ ताकि यह नौकरी खाने वाला बनने के बजाय नौकरी देने वाला बने। इसके साथ ही हमें एआई जगत में अपनी विश्वसनीयता भी कायम करनी होगी। ताकि फिर किसी गलगोटिया यूनिवर्सिटी की खुरापात से देश की फजीहत न हो। बल्कि हमारा शोध व विकास का तंत्र इतना मजबूत हो कि फिर हमारे किसी संस्थान को विदेशी उत्पाद को अपना नवाचारी उत्पाद बताने की जरूरत न पड़े। अन्यथा न केवल एआई समिट बल्कि देश की गरिमा को भी आंच आ सकती है। देश में शोध-अनुसंधान से जुड़े संस्थानों व विश्वविद्यालयों को सोचना होगा कि आज के कृत्रिम मेधा व इंटरनेट के जमाने में किसी खोज के बारे में फर्जी दावा कर पाना संभव नहीं है। बल्कि ऐसे कृत्य से उस संस्थान व देश की प्रतिष्ठा को आंच ही आती है। इसमें दो राय नहीं कि कृत्रिम मेधा आने वाले वर्षों में किसी भी देश की ताकत-संपन्नता का आधार बनेगी। लेकिन इस राह में कामयाबी हासिल करने के लिये देश में शोध-अनुसंधान की बुनियाद मजबूत करने की जरूरत है। अन्यथा देश को छद्म दावों से असहज स्थिति का सामना करना पड़ सकता है। इससे देश की प्रतिष्ठा को आंच भी आ सकती है। निस्संदेह, आज भारत को देश में रोबोटिक्स को लेकर मजबूत इकोसिस्टम तैयार करना होगा। इसके लिये देश के पास तकनीकी क्षमता और प्रतिभा उपलब्ध है, लेकिन जरूरत इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी चुनौतियों को दूर करने की है। जिसके लिये सरकारी संबल और इंजीनियरिंग की तमाम शाखाओं में बेहतर तालमेल जरूरी है। निश्चित रूप से साठ के दशक में रोबोटिक्स की शुरुआत करने वाले अमेरिका से मुकाबला करने में हमें कुछ वक्त लगेगा। भले ही भारतीय उद्योग जगत रोबोटिक्स के शुरुआती दौर में हो, लेकिन आज देश के हर आईआईटी संस्थान में रोबोटिक्स लैब हैं। हम अपनी तेज प्रगति पर गर्व कर सकते हैं।

