हठधर्मी चीन

संयम के साथ आर्थिक निर्भरता कम करें

हठधर्मी चीन

भारत व चीन के बीच कोर कमांडर स्तरीय 13वें दौर की वार्ता अनिर्णायक ही रही। वैसे वार्ता से बहुत ज्यादा उम्मीद थी भी नहीं, लेकिन वार्ता के बाद जैसे आक्रामक तेवर चीनी मीडिया में नजर आये, वे चौंकाने वाले हैं। हालांकि भारत ने भी चीन की नीयत पर सवाल उठाकर करारा जवाब दिया है। ऐसे में पूर्वी लद्दाख में हॉट स्प्रिंग्स और डेपसांग के विवादों का शीघ्र पटाक्षेप होगा, ऐसा मानना जल्दबाजी ही होगी। राजनयिक व सैन्य वार्ताओं की शृंखला के बाद दोनों देशों ने अगस्त में गोगरा क्षेत्र व फरवरी में पैंगोंग झील के उत्तरी व दक्षिणी किनारों पर अलगाव की प्रक्रिया पूरी की थी। बीते माह ताजिकिस्तान में भारतीय और चीनी विदेश मंत्रियों के बीच हुई बैठक में शेष मुद्दों पर शीघ्र समाधान की उम्मीद जगाई गई थी। लेकिन हालिया सैन्य वार्ता की विफलता संकेत है कि मौजूदा गतिरोध का दूर होना इतना आसान नहीं होगा। यह गतिरोध दोनों देशों के बीच विश्वास की कमी को तो दर्शाता ही है, साथ ही बताता है कि जमीनी स्तर पर स्थिति असहज है। यही वजह है कि भारतीय पक्ष ने दावा किया कि भारत द्वारा दिये गये ‘रचनात्मक सुझाव’ चीन को रास नहीं आ रहे थे। वहीं दूसरी ओर चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के वेस्टर्न थिएटर कमांड यानी डब्ल्यूटीसी का आरोप था कि भारत की मांगें अनुचित और अवास्तविक हैं, जिससे बातचीत में मुश्किलें आ रही हैं। ऐसे में भारतीय सेना को एक बार फिर आने वाली सर्दियों में जटिल भौगोलिक परिस्थितियों में चीनी चुनौती से मुकाबले के लिये डटे रहना पड़ेगा। वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सेना की तैनाती अपरिहार्य हो गई है। इसके लिये व्यापक रणनीति की जरूरत होगी, ताकि इन दुर्गम इलाकों में सेना का स्थायी ढांचा तैयार हो, जिससे किसी भी विषम परिस्थिति में तत्परता से जवाब दिया जा सके। यह क्षेत्र किस कदर चीन की प्राथमिकताओं में है, यह इस बात से पता चलता है कि डब्ल्यूटीसी को एक साल में चौथा कमांडर मिला है।

दरअसल, चीन के खिलाफ वैश्विक शक्तियों के साथ जैसे-जैसे भारत की साझेदारी में विस्तार हो रहा है, चीन की प्रतिक्रिया में भी तल्खी आ रही है। हाल ही में उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश के तवांग सेक्टर में चीनी सैनिकों की घुसपैठ इसी आक्रामकता का विस्तार है, जो बताता है कि विस्तारवादी चीन भारत विरोध की कोशिशों में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ने वाला। हालांकि, भारत ने एलएसी पर दीर्घकालिक शांति सुनिश्चित करने की जवाबदेही चीन के पाले में डालने का प्रयास किया है, लेकिन देश को चीन के दुस्साहस से बचने के लिये अधिक सतर्क रहने की जरूरत है। दरअसल, चीन इसलिये भी आक्रामकता दिखा रहा है ताकि वह समाधान अपने अनुरूप निकाल सके। चीन ने कभी भी भारतीय सीमाओं को नक्शे के अनुसार नहीं माना। वह निर्जन इलाकों में लगातार बढ़ता रहा है और फिर पीछे हटने का नाम नहीं लेता। फिर अपनी करतूतों पर पर्दा डालने के लिये आक्रामकता का सहारा लेता रहा है। बयानों में तो खुद को ईमानदार दिखाता है, लेकिन हकीकत में उसकी छल-कपट की नीतियां जारी रहती हैं। लेकिन इस बार भारत ने उसकी आक्रामकता का जिस तरह से करारा जवाब दिया और उसके खिलाफ जैसे अंतर्राष्ट्रीय समर्थन जुटाया है, उससे चीन बौखलाया हुआ है। दरअसल, चीन की परेशानी की वजह यह भी है कि भारत ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीनी निरंकुशता पर लगाम लगाने की कोशिश शुरू कर दी है। अमेरिका, आस्ट्रेलिया व जापान के साथ भारत के मिलने से मजबूत हुआ क्वाड संगठन चीन को बेचैन कर रहा है। जब भी भारत की ऐसी कोशिश कामयाब होती है, चीन की बौखलाहट सीमा विवाद पर नजर आती है। ऐसे में भारत को कूटनीतिक रूप से तो चीन का मुकाबला करना ही होगा, साथ भी अपनी सीमाओं की चौकसी दुरुस्त करनी होगी। हम आयात में चीन पर निर्भरता कम करके उसे करारा जवाब दे सकते हैं। आत्मनिर्भर भारत की मुहिम इस सोच का विस्तार है, जिसमें एक नागरिक के रूप में हमारी जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है। हमारी आर्थिक निर्भरता कम होने से चीन की आक्रामकता पर लगाम लग सकेगी। 

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