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मेहनतकशों की बेकद्री

गिग-वर्कर्स की मांगों को गंभीरता से लें

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बाजार आने-जाने के झंझट से बचा लोगों के घरों में तुरत-फुरत जीवन उपयोगी सामान पहुंचाने वाले गिग-वर्कर्स की जटिल कार्यपरिस्थितियां और पसीने का मोल न मिलना, बेहद चिंता की बात है। अपना व परिवार का पोषण करने वाले ये युवा अकसर सरपट मोटरसाइकिल दौड़ाते और सीढ़ियां चढ़कर ऊंची मंजिलों में दरवाजों तक सामान पहुंचाते देखे जा सकते हैं। बेहद कम मेहनताने, कंपनी मालिकों के दबाव व ग्राहकों की उपेक्षा झेलते गिग वर्कर्स ने नये साल की पूर्व संध्या पर हड़ताल करके अपनी बदहाली को ही उजागर किया है। संवेदनशील कार्य परिस्थितियों और नौकरी की असुरक्षा के चलते गिग-वर्कर्स हड़ताल पर थे। हालांकि, नये साल पर काम के दबाव व पूरी तरह संगठित न होने के कारण इनकी हड़ताल का कुछ ही इलाकों में असर देखा गया। पूरे देश में सामान की आपूर्ति बाधित हुई हो, ऐसा भी कोई समाचार नहीं मिला है। लेकिन गिग-वर्कर्स की विषम कार्य-परिस्थितियों की ओर पूरे देश का ध्यान जरूर गया है। पिछले दिनों आप के राघव चड्ढा और राजद के मनोज कुमार झा जैसे सांसदों ने गिग वर्कर्स के शोषण का मुद्दा संसद में उठाया था। निस्संदेह, देश की गिग अर्थव्यवस्था ने रोजगार सृजन में अपनी क्षमता साबित की है। विडंबना है कि भारत युवाओं को देश का कहा जाता है, लेकिन हम उनकी आकांक्षाओं का रोजगार नहीं दे पा रहे हैं। दरअसल, गिग-वर्कर्स की प्रमुख मांग है कि उनके काम का बेहतर भुगतान हो और उनके लिये बेहतर कामकाजी परिस्थितियां बनायी जाएं। उनकी इस हड़ताल ने इन मुद्दों पर देश का ध्यान खींचा है। लेकिन देश के प्रमुख खाद्य वितरण करने वाली कंपनी ने 31 दिसंबर को इस हड़ताल के बावजूद ऑर्डर में रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की। वहीं थके-हारे बाइकर्स अपनी अनगिनत शिकायतें व्यक्त करते रहे। दरअसल, विडंबना यह है कि खूब काम लेने के बावजूद गिग-वर्कर्स को पारंपरिक नियोक्ता-कर्मचारी के दायरे से बाहर अाजीविका कमाने वाले व्यक्तियों के रूप में परिभाषित किया जाता है।

दरअसल, गिग-वर्कर्स को नई अर्थव्यवस्था में नियोक्ता एक कर्मचारी के रूप में नियुक्त करने के दायित्व से बचने का प्रयास करते हैं। लेकिन नियोक्ताओं की हायर व फायर की रणनीति के चलते, वे असुरक्षित कार्य परिस्थितियों में काम करने को बाध्य होते हैं। इसके बावजूद वे आज शहरी जीवन व्यवस्था के लिये अभिन्न अंग बन गए हैं। लोगों की छोटी-छोटी जरूरतों के लिए दौड़ते रहते हैं। वे सामान दस मिनट तक दरवाजे पर पहुंचाने के दबाव में हांफते-भागते, मोटरसाइकिल दौड़ाते और सीढ़ियों पर सामान चढ़ाते अकसर नजर आते हैं। आम तौर पर उपभोक्ताओं का व्यवहार भी अच्छा नहीं होता। देरी होने पर इन्हें झिड़का जाता है। सामान में नुक्स निकालकर इन्हें दौड़ाया जाता है। आज भारत में इनकी संख्या सवा करोड़ से अधिक है। अनुमान है कि वर्ष 2030 तक इन कामगारों की संख्या दो करोड़ पैंतीस लाख तक हो सकती है। निश्चित रूप से आने वाले वर्षों में इस क्षेत्र की अनदेखी नहीं की जा सकती। लेकिन फिलहाल स्थिति यह है कि मेहनताने में कटौती, जरा सी चूक पर आर्थिक दंड तथा समय से पहले पहुंचाने के दबाव से गिग-वर्कर्स त्रस्त हैं। मुश्किल परिस्थितियों में काम करते रहने के बावजूद ये कामगार हड़ताल में बड़ी संख्या में भाग नहीं ले पाये। दरअसल, प्लेटफॉर्म अकसर प्रोत्साहन और अतिरिक्त वेतन के जरिये श्रमिकों के विरोध प्रदर्शन को दबा देते हैं। निश्चित रूप से गिग-वर्कर्स का लगातार 14 घंटे काम करने के बावजूद सात-आठ सौ रुपये कमाना और दुर्घटना बीमा से वंचित रखना, इस व्यवस्था की उन खामियों की ओर भी इशारा करता है, जिन्हें केवल फौरी लालच या प्रोत्साहन से ठीक नहीं किया जा सकता। ऐसे में हालिया श्रम सुधारों का महत्व बढ़ जता है। जिसमें पहली बार, गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों को कानून के तरह औपचारिक रूप से परिभाषित किया गया है। एग्रीगेटर के टर्नओवर का एक से दो फीसदी सामाजिक सुरक्षा कोष में अनिवार्य योगदान और आधार से जुड़े सार्वभौमिक खाता नंबर को कानूनी मान्यता की दिशा में एक लंबे समय से प्रतीक्षित बदलाव का संकेत देते हैं। हालांकि, कार्यान्वयन ही यह निर्धारित करेगा कि ये सुधार परिवर्तनकारी साबित होते हैं या केवल प्रतीकात्मक रहते हैं।

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