किसी भी समाज में यह प्रबल धारणा रही है कि परिवार के किसी सदस्य की तब तक सेवा की जाए, जब तक उसके प्राण कुदरती तौर पर न निकल जाएं। खासकर भारतीय समाज में इस मुद्दे को लेकर गहरी संवेदनशीलता रही है। कई स्थानों पर तो अपने आत्मीय की मृत्यु के बाद भी उसे वर्षों तक जीवन लौटने की आस में घर पर रखा गया। लेकिन जब कोई अपना प्रिय उस स्थिति में पहुंच जाए, जहां से सामान्य जीवन में लौट पाना संभव ही न हो, तो बदलते वक्त के साथ कानून के दायरे में उसकी मुक्ति की भी बात होने लगी है। हाल ही में देश के सुप्रीम कोर्ट का 13 वर्ष से कोमा में रहने वाले एक युवा के लिये निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति देने का निर्णय, जीवन के अंतिम चरण की देखभाल पर भारत में विकसित होते न्यायशास्त्र में नया मोड़ है। किसी असाध्य स्थिति में कृत्रिम जीवन रक्षक प्रणाली हटाने की अनुमति देने वाला यह फैसला, अदालत द्वारा पहले से निर्धारित प्रक्रिया का पहला व्यावहारिक प्रयोग है। निस्संदेह,यह मामला उन रोगियों के परिवारों के सामने उपस्थित पीड़ादायक दुविधा को ही उजागर करता है, जिनके ठीक होने की कोई वास्तविक संभावना नहीं होती। जो महज चिकित्सकीय मदद से ही जीवित रहते हैं। इस मामले में चिकित्सा बोर्डों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि निरंतर उपचार का कोई चिकित्सीय उद्देश्य नहीं था। इससे केवल जैविक अस्तित्व को ही लंबा खींच दिया गया। बहरहाल, इस बाबत अदालत की स्वीकृति एक कठिन सत्य को स्वीकार करती है कि जीवन की गरिमा, मृत्यु में भी गरिमा तक विस्तारित होनी चाहिए। निस्संदेह, भारत में इच्छामृत्यु पर कानूनी प्रगति धीमी रही है। इस मामले में पहली बार अरुणा शानबाग मामले में ध्यान दिया गया था। वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के मौलिक अधिकार के अंतर्गत गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार देने के साथ यह मुद्दा अपने चरम पर पहुंचा।
दरअसल, इच्छामृत्यु से जुड़ी दुविधा, इससे जुड़े सिद्धांतों के क्रियान्वयन की अनिश्चितता को लेकर बनी रही है। जिसके चलते परिवारों व डॉक्टरों को जटिल प्रकिया व कानूनी चिंताओं का सामना करना पड़ रहा है। निस्संदेह, हालिया फैसले से भी न्यायिक दिशा-निर्देशों मात्र पर निर्भर रहने की सीमाएं उजागर हुई हैं। बल्कि यहां तक कि देश की शीर्ष अदालत ने भी निष्क्रिय इच्छामृत्यु, लिविंग विल और जीवन को लेकर अंतिम निर्णय को नियंत्रित करने वाले व्यापक कानून की तत्काल आवश्यकता पर बल दिया। निस्संदेह, ऐसे कानून में नैतिक संवेदनशीलता और प्रक्रियात्मक स्पष्टता के बीच बेहद संतुलन होना चाहिए। यह प्रक्रिया कमजोर रोगियों को दुर्व्यवहार से बचाते हुए, यह भी सुनिश्चित करे कि परिवार और चिकित्सा पेशेवर कानूनी परिणामों के भय के बिना कार्य कर सकें। इस मामले में स्पष्ट प्रोटोकॉल, पारदर्शी चिकित्सा मूल्यांकन और रोगी की स्वायत्तता का सम्मान आवश्यक है। अंतत, निष्कर्ष यह भी है कि जब उपचार असंभव हो तो चिकित्सा उपायों से रोगी की पीड़ा को लंबा नहीं खींचा जाना चाहिए। निस्संदेह, शीर्ष अदालत की कारगर सलाह के मद्देनजर देश के नीति-नियंताओं को एक मानवीय कानूनी ढांचा तैयार करने के बारे में गंभीरता से सोचना चहिए। जो टाली न जा सकने वाली विषम स्थिति में व्यक्ति को गरिमा के साथ जीने व मरने की अनुमति दे सके। निस्संदेह, देश में इस बाबत एक संवेदनशील कानून बनाने की सख्त जरूरत महसूस की जा रही है। साथ ही ऐसा कानून बनाते वक्त मानवीय संवेदनशीलता तथा कानूनी सुरक्षा कवच के बीच संतुलन बनाना भी उतना ही जरूरी होगा। वहीं हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा संकीर्ण लक्ष्यों को पूरा करने के लिये किसी व्यक्ति की दबाव में इच्छामृत्यु के लिये परिस्थितियां पैदा न की जा सकें। दुनिया के तमाम विकसित देशों में इस आशंका के चलते ही इच्छामुत्यु को कानूनी रूप देने से परहेज किया गया है। यह जटिल मामला भी है, जिसके निर्धारण के लिये कानूनी स्पष्टता और मामले की गहन निगरानी भी उतनी ही जरूरी है।

