नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट हमारे नीति-नियंताओं को आईना दिखाने वाली है। चौंकाने वाली ये रिपोर्ट बताती है कि देश में नब्बे फीसदी से अधिक स्नातक ऐसी नौकरियां कर रहे हैं, जिसका उनकी डिग्री से कोई संबंध नहीं होता है। जाहिरा तौर पर यह आंकड़ा हमारी शिक्षा व्यवस्था की विसंगतियों को ही उजागर करता है। इसके मायने हैं कि आज भी महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों तथा अन्य शिक्षण संस्थानों में ऐसी शिक्षा दी जा रही है ,जो मौजूदा आर्थिकी से नहीं जोड़ती। देश-दुनिया का मौजूदा आर्थिक परिदृश्य बिल्कुल बदल चुका है। सरकारी नौकरियां ना के बराबर हैं, मगर हर स्नातक उसके लिये आवेदन करता है। जबकि रोजगार बाजार में उतरने के लिये युवाओं के पास कौशल विकास, व्यावहारिक दक्षता, तकनीकी ज्ञान और कुशल प्रबंधन का अनुभव होना जरूरी है। दरअसल, अधिकांश शिक्षण संस्थानों में आज भी वर्षों पुराना वह पाठ्यक्रम पढ़ाया जा रहा है जो मौजूदा प्रतिस्पर्धी समय में रोजगार उपलब्ध कराने की गारंटी नहीं देता। इसके लिये जरूरी है कि युवाओं को उद्योग, बाजार व व्यावसायिक संस्थानों की जरूरतों के अनुरूप शिक्षा दी जाए। लेकिन विडंबना यह है कि तीन-चार साल के अध्ययन के बाद छात्रों को जो डिग्री मिलती है, वह उन्हें रोजगार के बाजार में कदमताल करने का हुनर नहीं देती। यह तभी संभव है जब हमारी शिक्षा, कौशल विकास व अर्थव्यवस्था में तारतम्य स्थापित हो सकेगा। लेकिन हर साल लाखों बीए, एम.ए. व अन्य मानविकीय विषयों की डिग्री हासिल करने वाले बेरोजगारों की पंक्ति में शामिल हो जाते हैं। यही वजह है कि देश में स्नातक बेरोजगारों का प्रतिशत देश की सामान्य बेरोजगारी दर से कहीं अधिक है। महिला स्नातकों की दर तो पुरुष स्नातकों से भी कहीं ज्यादा है। ऐसे में उस उच्च शिक्षा का क्या औचित्य जो युवाओं को रोजगार नहीं दे सकती। असल में, बदलते वक्त के अनुरूप युवाओं की शिक्षा में जो जरूरी बदलाव किए जाने चाहिए थे, वे अभी तक सिरे नहीं चढ़ पाये हैं।
दरअसल, हर युवा में कला-कौशल का एक विशिष्ट गुण होता है। उसका मूलभूत रुझान एक विशेष क्षेत्र में होता है। लेकिन इस गुण को न तो अभिभावक समझ पाते हैं और न ही शिक्षक। छात्र भेड़चाल में आकर शिक्षण संस्थानों में दाखिला लेते हैं। लेकिन यह उनकी रुचि का विषय नहीं होता है। कई अध्ययन बताते हैं कि अपनी रुचि के विषय में युवा बेहतर कार्य प्रदर्शन करते हैं। यह संभव नहीं कि हर छात्र डॉक्टर व इंजीनियर ही बने। लेकिन समाज में ऐसा करने की होड़ बनी हुई है। एक समय बैंकिंग, रेलवे आदि में भविष्य तलाशने की होड़ लगी। पिछले कुछ समय में कंप्यूटर साइंस में इंजीनियरिंग करने का फैशन चला। वैश्विक स्थितियों में बदलाव व एआई के वर्चस्व के चलते अचानक कंप्यूटर साइंस के क्षेत्र में नौकरियों में तेजी से कटौती हुई। लेकिन देश में हजारों शिक्षण संस्थान आज भी इस भेड़चाल में युवाओं को धकेल रहे हैं। विडंबना यह है कि हमारे नीति-नियंताओं ने दूरदर्शी दृष्टिकोण न अपनाते हुए, भविष्य की दीवार पर लिखी इबारत को नहीं पढ़ा। यही वजह है कि दुनिया में सबसे ज्यादा युवाओं का देश होने के बावजूद हम इस जनसांख्यिकीय लाभ उठाने में विफल रहे हैं। हमारे उद्योगों ने भी अपनी जरूरत के मुताबिक युवाओं को प्रशिक्षित करने के लिये इस बाबत चलाये जा रहे कार्यक्रमों में सहयोग नहीं किया। यही वजह है कि आज देश में कामचलाऊ इंटर्नशिप व अप्रेंटिसशिप का बोलबाला है। यदि हमारा निजी क्षेत्र इस दिशा में रचनात्मक पहल करता तो उसे बड़ी संख्या में अपनी जरूरतों के मुताबिक युवा प्रतिभाएं मिल सकती थीं। इसे दिशा देने में देश की प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थाओं आईआईटी व आईआईएम की बड़ी भूमिका हो सकती थी। याद रहे कि कौशल विकास का मतलब केवल एक सार्टिफिकेट हासिल करना नहीं है। देश को कौशल विकास से लैस युवाओं की जरूरत है। जो आत्मनिर्भर भारत बनाने के लिये अनिवार्य शर्त भी है। नीति-नियंताओं को इस मामले में चीन की औद्योगिक व तकनीकी क्रांति से जुड़ी नीतियों से सीखने की आवश्यकता है। जरूरत इस बात की है कि हमारे स्कूल-काॅलेज से लेकर विश्वविद्यालयों तक में रोजगार से जुड़े पाठ्यक्रमों को तरजीह दी जाए।

