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रिश्तों में छल

विवाहेत्तर संबंधों से दरकता विश्वास

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हाल ही में सामने आए एक सर्वेक्षण में, यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि जीवन साथी की निगरानी के लिये बड़ी संख्या में डिटेक्टिव एजेंसियों की मदद ली जा रही है। तमाम विवाहेत्तर संबंधों की पड़ताल से बड़ी संख्या में शक सही निकल रहे हैं। हालांकि, इस सर्वे के दायरे और उसकी विश्वसनीयता की कसौटी के प्रश्न सामने हैं, लेकिन यह एक कड़वी हकीकत है कि हमारी पारिवारिक संस्था में अविश्वास की सेंध लग रही है। खाओ-पियो मौज करो की पश्चिमी संस्कृति के अंधानुकरण से वैवाहिक संस्था की शुचिता को आंच आई है। समाज में अलगाव, तलाक व हिंसक प्रतिशोध के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। रही सही कसर कथित सोशल मीडिया ने पूरी कर दी है, जिसने हमारे समाज में वर्जित माने जाने वाले भदेस विषयों को न्यू नॉर्मल बना दिया है। दरअसल, हाल के वर्षों में भारतीय समाज तेजी से संक्रमणकालीन दौर में जा पहुंचा है। कभी जिस रिश्ते को सिरे चढ़ाते वक्त जन्म-जन्मांतर साथ निभाने का वायदा किया जाता था, आज उसी जीवन साथी की निगरानी के लिये डिटेक्टिव एजेंसियों की मदद ली जा रही है। यह दुखद ही है कि जिन जीवन मूल्यों, संयम व शुचिता के रिश्तों के लिये भारत दुनिया में जाना जाता था, वहां आज यौन स्वच्छंदता व विवाहेत्तर संबंधों का दायरा बढ़ रहा है। एक समय था कि भारतीय संयुक्त परिवार की छांव में संयमित व मर्यादित व्यवहार करते थे। बड़ों का अनुशासन मर्यादा की रक्षा करता था। कामकाज का स्वरूप और स्थानीय रोजगार भी जीवन व्यवहार को संतुलित व संयमित करते थे। लेकिन हमारी कार्य संस्कृति में बदलाव व देश-विदेश में कामकाज के लिये बाहर जाने के बाद व्यक्ति स्वच्छंद व्यवहार करने लगा। यही वजह है कि विदेश में रहने वाले पति या पत्नी के व्यवहार की पड़ताल के लिये डिटेक्टिव एजेंसियों की मदद लेने के मामले लगातार उजागर हुए हैं। जिसके बाद मुकदमेबाजी, अलगाव व टकराव की खबरें सामने आने लगती हैं।

दरअसल, विगत में भारतीय समाज में व्यक्ति के सार्वजनिक व्यवहार को संयुक्त परिवार व समाज संयमित करता था। लेकिन धीरे-धीरे आर्थिक आत्मनिर्भरता के बाद लोगों ने बड़े-बुजर्गों व समाज के हस्तक्षेप को अस्वीकार करना शुरू कर दिया। विगत में हमारी फिल्मों व टीवी निर्माताओं ने दर्शकों की भीड़ जुटाने के लिये हमेशा असामान्य वैवाहिक रिश्तों को अपनी कथावस्तु बनाया। इन असामान्य रिश्तों को इस ग्लैमर के साथ पेश किया जाता रहा है कि कालांतर उसका प्रभाव समाज पर नजर आने लगा। आज तो विदेशी धरती से संचालित इंटरनेट व सोशल मीडिया ने तो असामान्य रिश्तों की पराकाष्ठा दर्शा दी। विडंबना यह रही है कि मीडिया ने भी ऐसी नकारात्मक प्रवृत्तियों को इतनी तरजीह दी कि समाज के एक तबके में असामान्य रिश्तों को सामान्य माना जाने लगा। एक हकीकत यह भी है कि देश पर तमाम विदेशी आक्रांताओं ने भारतीय संस्कृति को इतनी क्षति नहीं पहुंचाई होगी, जितनी इंटरनेट व सोशल मीडिया के माध्यम से परोसी जा रही अपसंस्कृति ने विकृतियां पैदा की। नई पीढ़ी ही नहीं, उम्र दराज लोग भी कामदेव के मोहपाश में बंधे वर्जनाओं को लांघने लगे हैं। सोशल मीडिया पर बालाओं के मोहपाश में बंधकर गांठ का धन गंवाने वालों में बुजुर्गों की संख्या भी कम नहीं है। निस्संदेह, विवाह एक पवित्र बंधन है। जिसका निर्वहन संयम, सहजता, सहयोग, धैर्य और त्याग से ही होता है। लगता है कहीं न कहीं नई पीढ़ी लगातार धैर्य खोती जा रही है। रिश्तों के दीर्घकालिक निर्वहन का मूलमंत्र यही है कि हम जीवन-साथी की छोटी-मोटी कमियों को नजरअंदाज करके सामंजस्य के साथ जीवन की गाड़ी को आगे बढ़ाएं। असामान्य रिश्तों का अल्पकालिक सुख भले ही लुभाता हो, मगर उसकी कीमत परिवार को लंबे समय तक चुकानी पड़ती है। जिसका नकारात्मक प्रभाव बच्चों के मन-मस्तिष्क पर भी घातक होता है। यह भी एक हकीकत है कि जब परिवार के विवाद घर की दहलीज लांघते हैं, तो इससे लाभ उठाने वाले पेशेवरों की पूरी बिरादरी मुस्तैद खड़ी होती है। निश्चित ही रिश्तों में छल की प्रवृत्ति भारत में मूल्यों वाली विवाह संस्था के लिये एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। इसका मुकाबला संयम, सहयोग, त्याग व समर्पण जैसे जीवन मूल्यों से ही संभव है। इसका समाधान कोर्ट-कचहरियों में नहीं मिलेगा।

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