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कर्ज के मर्ज

पंजाब-हरियाणा के किसान ऋण दुश्चक्र में

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गांधी जी अक्सर कहा करते थे कि भारत की आत्मा गांव और खेतीकिसानी में बसती है। लेकिन आजादी के बाद भी कृषि क्षेत्र की विसंगतियां व विरोधाभास अंतिम रूप से दूर नहीं हुए। भले ही किसान दमनकारी साहूकारों के चंगुल से किसी हद तक मुक्त हो गए हों, लेकिन धीरे-धीरे सरकारी, सहकारी और अन्य वित्तीय संस्थानों के कर्ज तले दबते चले गए। फिलहाल सकारात्मक पक्ष यह है कि केंद्र सरकार रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन, डिजिटल तकनीकों से खेती के तौर-तरीकों में बदलाव और ऋण विस्तार को आसान बनाने के लिये प्रयत्नशील है। लेकिन नकारात्मक पक्ष यह है कि किसान कर्ज के दुश्चक्र में फंसता जा रहा है। यह कड़वी सच्चाई हाल रिपोर्ट से प्रकाश में आए आंकड़ों से उजागर हुई है। पिछले दिनों प्रकाशित रिपोर्ट में यह चिंताजनक तथ्य सामने आया है कि अनाज के भंडार के रूप से प्रसिद्ध राज्य पंजाब व हरियाणा के किसान देश के सबसे ज्यादा ऋणग्रस्त राज्यों में शुमार हैं। हाल में जारी रिपोर्ट के अनुसार पंजाब व हरियाणा में प्रति कृषि परिवार पर 2.03 लाख और 1.83 लाख रुपये का ऋण बकाया है। जो देश में सबसे ज्यादा ऋण लेने वाले राज्यों में तीसरा व चौथा स्थान बनता है। यह स्थिति तब है जब ऋण का यह राष्ट्रीय औसत 74, 121 रुपये है। केवल आंध्र प्रदेश और केरल में ही इससे अधिक ऋण का बोझ दर्ज किया गया है। वहीं दूसरी ओर नागालैंड, मेघालय और अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों में कृषि ऋण नगण्य ही है। यह स्थिति भारतीय कृषि में गहरे संरचनात्मक असुंतलन को ही उजागर करती है। निस्संदेह, पंजाब और हरियाणा में किसान परिवारों पर भारी कर्ज कोई महज संयोग नहीं है। निर्विवाद रूप से पंजाब व हरियाणा ने देश में हरित क्रांति का नेतृत्व किया है। इन राज्यों ने समय की जरूरत के हिसाब से बहुउपयोगी कृषि को अपनाया है और भारत की खाद्य सुरक्षा की रीढ़ बने हैं। मगर विषम परिस्थितियों के चलते इसका अपेक्षित लाभ किसानों को नहीं मिल पाया।

लेकिन यह एक हकीकत है कि हाल के दशकों में खेती का यह मॉडल काफी दबाव में आ गया है। खेती-किसानी की लगातार बढ़ती लागत, स्थिर कृषि आय, छोटी और खंडित भू-जोत, अनियमित मानसून, खरीद प्रक्रिया में देरी और बढ़ते घरेलू खर्च ने ऋण पर निर्भरता का दुश्चक्र स्थापित कर दिया है। इसमें दो राय नहीं कि देश में संस्थागत ऋण की आसान उपलब्धता ने इन राज्यों में कृषि उत्पादकता को बढ़ावा दिया है। लेकिन यह भी एक कड़वी हकीकत है कि ऋण की सहज उपलब्धता ने किसानों के जीवनयापन के साधन के रूप में उधार लेने की प्रक्रिया को सामान्य स्थिति बना दिया है। किसान खेती-किसानी की जरूरतों से इतर भी बड़े पैमाने पर ऋण लेने लगे। वहीं दूसरी ओर केंद्र सरकार दावा करती रही है कि वह किसानों के हितों को हमेशा ही प्राथमिकता देती रही है। किसानों के जीवन में बदलाव के लिये 84.8 करोड़ किसानों के लिये डिजिटल आईडी, भौगोलिक संदर्भ पर आधारित फसल सर्वेक्षण और सुव्यवस्थित प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण से दक्षता और पारदर्शिता का वायदा किया जा रहा है। भारत के केंद्रीय बैंक आरबीआई द्वारा किसान क्रेटिड कार्ड योजना में प्रस्तावित सुधार-फसल चक्र के साथ ऋण की अवधि को संरेखित करना- इस बात का संकेत है कि ऋण को बदलती कृषि परिस्थितियों के अनुरूप विकसित किया जाना चाहिए। प्रौद्योगिकी और बेहतर ढंग से डिजाइन किए गए ऋण स्वागत योग्य कदम है। लेकिन ये प्रावधान अकेले ही गहरी जड़ें जमा चुके ऋण संकट की समस्या को दूर नहीं कर सकते हैं। यह कटु सत्य है कि यदि आय लागत के अनुरूप नहीं बढ़ती, यदि बदलते हालत में फसल विविधीकरण के प्रयास सिरे नहीं चढ़ते तथा देश में यदि जलवायु परिवर्तन का चक्र तेज होता है, तो ऋणों का दबाव बना रहेगा। अब चाहे ऋण कितनी भी कुशलता से संचालित किए जाएं। बहरहाल, ऐसे में केंद्र और राज्य सरकारों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे देश के अन्नदाता को ऋण संकट के गंभीर जाल से बाहर निकालने के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास करें।

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