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जानलेवा सड़कें

दुर्घटना उन्मुख क्षेत्रों में लक्षित हस्तक्षेप हो

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देश में आए दिन होने वाली सड़क दुर्घटनाओं को लेकर सरकार और समाज के स्तर पर चिंताएं तो व्यक्त की जाती हैं लेकिन इन्हें रोकने के लिये कारगर उपाय सिरे चढ़ते नजर नहीं आते। इस बारे में बार-बार वायदे किए जाते हैं, वहीं सुधार के लिये टुकड़ों-टुकड़ों में हस्तक्षेप किया जाता है। फलत: परिणाम वही ढाक के तीन पात रहता है। यह आंकड़ा दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश में हर साल 1.6 लाख से अधिक मौतें सिर्फ सड़क दुर्घटनाओं में होती हैं। विडंबना देखिए कि किसी भी सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति के मुकाबले सड़क दुर्घटनाएं ज्यादा लोगों की जान ले लेती हैं। हाल ही में सेव लाइफ फाउंडेशन द्वारा सड़क परिवहन व राजमार्ग मंत्रालय के लिये किए गए सर्वेक्षण में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। संस्था द्वारा वर्ष 2023 व 2024 में 100 जिलों में सड़क दुर्घटनाओं पर किए गए सर्वेक्षण की रिपोर्ट में कहा गया है कि शाम छह बजे से रात नौ बजे तक समय सड़क हादसों के लिये सबसे घातक होता है। इसके अलावा दुर्घटनाओं की संख्या में कमी लाने के लिये 18 सड़क गलियारों की पहचान की गई है, जिनमें सर्वेक्षण अवधि में सबसे अधिक मौते हुई थीं। इसके साथ ही दुर्घटना की दृष्टि से संवेदनशील सौ जिलों में ध्यान केंद्रित करने पर बल दिया गया है। निश्चित रूप से यह स्वागत योग्य पहल है। यह जानते हुए कि दुर्घटना रोकने के लिये सामान्य सलाह और एक समान नीतियां लक्ष्य हासिल करने में विफल रही हैं। यकीनी तौर पर दुर्घटना उन्मुख क्षेत्रों में लक्षित हस्तक्षेप बदलाव लाने के लिये बेहतर दृष्टिकोण साबित हो सकता है। बहुत संभव है कि एक खराब ढंग से डिजाइन किया गया मोड़, सड़क पर पर्याप्त रोशनी का न होना, प्रवर्तन में शिथिलता तथा ड्राइविंग में लापरवाही की आदतें, किसी क्षेत्र या जिला विशेष में सड़क दुर्घटनाओं की वजह हो सकती है। निश्चित तौर पर उच्च मृत्यु दर वाले गलियारों का मानचित्रण अधिकारियों को, उन क्षेत्रों में इंजीनियरिंग सुधार, प्रवर्तन और आपातकालीन प्रतिक्रिया बल तैनात करने में सहायक हो सकता है।

निस्संदेह, साक्ष्य और अतीत के अनुभव बताते हैं कि लक्षित प्रवर्तन बेहतर परिणाम दे सकता है। बंगलुरू का अनुभव बताता है कि लक्षित प्रयासों से वहां लगातार दूसरे वर्ष सड़क दुर्घटनाओं में वृद्धि के बावजूद मृत्यु दर में कमी आई है। जो इन प्रयासों की सार्थकता को दर्शाता है। निस्संदेह, अन्य शहरों को भी डेटा आधारित पुलसिंग, सीसीटीवी निगरानी और यातायात नियमों के उल्लंघन पर कड़ी निगरानी रखने के लिये इस मॉडल को अपनाना होगा। इसमें दो राय नहीं कि केंद्र सरकार की योजना तभी सफल होगी, जब वह पहचान और प्रतीकात्मकता से आगे बढ़कर काम करे। इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता है कि सड़क सुरक्षा से जुड़ी पिछली कोशिशें केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और स्थानीय अधिकारियों के बीच बेहतर तालमेल न होने से विफल रही हैं। इन सुरक्षा उपायों के क्रियान्वयन में व्याप्त कमियों को दूर करने के लिये निरंतर वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराने, कार्यान्वयन एजेंसियों की जवाबदेही तय करने के साथ ही परिणामों का नियमित ऑडिट करना आवश्यक है। इस बाबत सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राज्यों को कार्रवाई करने के लिये सशक्त बनाया जाना चाहिए। वैसे सिर्फ राजमार्गों पर ही ध्यान केंद्रित करने के भी कई खतरे हैं। यह जानते हुए कि देश में राष्ट्रीय राजमार्ग सड़क नेटवर्क का मुश्किल से 2 से तीन प्रतिशत हिस्सा ही है। लेकिन ट्रैफिक की गति की तीव्रता के चलते इन पर होने वाली मौतों की संख्या कहीं ज्यादा है। साल 2025 की पहली छमाही ही में करीब छब्बीस हजार से अधिक मौतें हुई हैं। वास्तव में शहरी सड़कें, जहां पैदल यात्री,साइकिल चालक और दोपहिया वाहन चालकों की मौत सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या का बड़ा हिस्सा है, वे अक्सर उपेक्षित रह जाती हैं। इन सड़कों को बेहतर बनाने के लिये निवेश बढ़ाए जाने की जरूरत है। वहीं दूसरी ओर सुरक्षित डिजाइन तैयार करने, वाहनों की गति का प्रबंधन करने, हेलमेट और सीट बेल्ट बांधना सुनिश्चित करने तथा आपातकालीन देखभाल व्यवस्था को साथ-साथ लागू करने की भी आवश्यकता है।

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