मानसून की बारिश जहां किसानों के लिये राहत लेकर आती हैं, वहीं तंत्र की काहिली और भ्रष्टाचार की पोल भी खोल देती है। मानसून की शुरुआती बारिश ने एक बार फिर सार्वजनिक संरचनाओं की जानलेवा खामियों को ही उजागर किया। मुंबई में बारिश के पानी में नजर न आने वाले एक खुले मैनहोल में गिरने से एक व्यक्ति की मौत हो गई। वहीं हाल ही में खुले बहुचर्चित दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे ने पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर की बदहाली उजागर कर दी। ये घटनाएं हमें बताती हैं कि बारिश के मौसम में स्थानीय निकायों की लापरवाही व खराब इंजीनियरिंग के चलते कैसे लोगों का जीवन जोखिम में पड़ जाता है। निस्संदेह, मुंबई में हुए हादसे को रोका जा सकता था। कथित साफ-सफाई के बाद लापरवाही से खुला छोड़ा गया मैनहोल तब जानलेवा बन गया, जब बारिश के पानी से ढका खुला मैनहोल नजर नहीं आया। निस्संदेह, दुर्घटना के बाद अधिकारियों को निलंबित करना और ठेकेदार को काली सूची में डालना, फौरी तौर पर सही कदम है, लेकिन सवाल यह है कि हादसे होने के बाद ही ऐसे कदम क्यों उठाये जाते हैं? पहले से ही नागरिकों की सुरक्षा के लिये चाक-चौबंद व्यवस्था क्यों नहीं होती? कायदे से किसी सड़क पर मैनहोल खोलने से पहले बैरिकेड्स लगाने, चेतावनी देने वाले संकेत और अस्थायी कवर से ढकना बुनियादी सुरक्षा उपाय हैं। जिन्हें अनिवार्य रूप से सुनिश्चित किया जाना चाहिए। बीते साल भी दिल्ली में भारी बारिश के दौरान स्कूटर फिसलने से एक महिला और उसका तीन साल का बेटा पानी से भरे नाले में बह गये थे। ये असुरक्षित ड्रेनेज संरचना की घातकता को ही दर्शाता है। विडंबना है कि हमारा तंत्र सालभर सोया रहता है और जब बरसात शुरू होने को होती है, तब मरम्मत- नालों की सफाई के काम की औपचारिकता पूरी करता है। निस्संदेह, संबंधित विभागों के अधिकारियों की सर्वकालिक जवाबदेही तय की जानी चाहिए। फिर किसी भी तरह की लापरवाही होने पर सख्त दंडात्मक कार्रवाई भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
वहीं दूसरी ओर दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के धंसने की घटना भी एक चिंताजनक स्थिति को दर्शाती है। यह निर्विवाद सत्य है कि कोई सड़क बारिश आने के कारण रातों-रात नहीं धंसती है। इसमें सड़क निर्माण के दौरान सतर्कता की अनदेखी भी शामिल है। दरअसल, सड़क निर्माण के दौरान जल निकासी की कारगर व्यवस्था न होने, मिट्टी की स्थिरता सुनिश्चित न करने और निर्माण में गुणवत्ता की कमी से ही बरसाती पानी सड़क की सतह के नीचे मिट्टी को धीरे-धीरे काटने लगता है। कालांतर यह मिट्टी का कटाव ही सड़क धंसने की वजह बन जाता है। साल 2024 में बिहार में पुलों के ढहने की शृंखला ने भी निर्माण कार्य में घटिया सामग्री के उपयोग की हकीकत बतायी थी। इसी तरह की चिंताएं अकसर सामने आती हैं जब आधुनिक कहे जाने वाले महानगरों बेंगलुरू और मुंबई में हर मानसून में सड़कों में बने गड्ढे दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं। इतना ही नहीं इससे यातायात में भी अराजकता व व्यवधान पैदा होता है। बहरहाल, इन सभी घटनाओं के मूल में एक बात तो समान है कि स्थानीय निकाय व प्रशासन जोखिमों का समय रहते अनुमान नहीं लगा पाते हैं। यह तथ्य सभी अधिकारी जानते हैं कि एक निश्चित समय पर मानसून आता है। बाकायदा समय-समय पर सूचना माध्यमों में मौसम विभाग द्वारा मानसून की भविष्यवाणी की जाती है। लेकिन अधिकारी तब जागते हैं जब स्थितियां जटिल हो जाती हैं। वे इन हालातों को अप्रत्याशित आपात स्थिति के रूप में दर्शाने का प्रयास करते हैं। दरअसल,कई स्तरों पर होने वाली कमीशनखोरी व राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते अकसर ठेकेदारों की जवाबदेही तय नहीं की जाती है। विडंबना यह भी है कि निरीक्षण भी अक्सर खानापूर्ति जैसा ही होता है। वहीं दूसरी ओर सार्वजनिक संरचना का रखरखाव भी निवारक के बजाय प्रतिक्रियात्मक ही रहता है। वास्तव में कारगर समाधान के लिये जरूरी है कि मानसून से पहले सुरक्षा उपायों को संस्थागत ढंग से सुनिश्चित किया जाए, इंजीनियरिंग मानकों को सख्ती से लागू किया जाए, गुणवत्ता की स्वतंत्र जांच हो और ठेकेदार को कानूनी रूप से जवाबदेह बनाया जाए। दुर्घटना होने के बाद प्रतिक्रिया देने के बजाय यह सुनिश्चित हो कि ऐसी घटनाएं हो ही न पाएं।
