बदलते वक्त के साथ समाज में बढ़ते आक्रामक व्यवहार के चलते अपराधों का ग्राफ भी तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन किशोरों की अपराधों में संलिप्तता बढ़ना गंभीर चिंता का विषय है। हाल के दिनों में देश में किशोर अपराधों से जुड़ी अनेक ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जिन्होंने देश को गहरी चिंता में डाला है। जो बाल अपराधों के सामाजिक कारणों पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत पर बल देता है। निस्संदेह, यह विचारणीय प्रश्न है कि छोटे-छोटे विवादों के बीच किशोर हिंसक क्यों हो रहे हैं। जिसकी परिणति अकसर क्रूर हत्या के रूप में सामने आती है। पिछले दिनों दिल्ली के दयालपुर क्षेत्र में सिर्फ चार सौ रुपये के विवाद में एक युवक की निर्मम हत्या डराने वाली है। वहीं किशोरों में कानून का भय न होना गंभीर मसला है। बताया जाता है कि इस युवक की हत्या में तीन नाबालिग संलिप्त थे। इस घटना में तीन किशोर एक युवक पर लगातार चाकू मारते रहे। हिंसक प्रवृत्ति की पराकाष्ठा देखिए कि इनका चौथा साथी बाकायदा मोबाइल पर घटना का वीडियो बनाता रहा। निस्संदेह, यह घटना किसी भी सभ्य समाज में सिहरन पैदा करने वाली है कि किशोर में यह आपराधिक दुस्साहस कहां से आ रहा है। जाहिर बात है कि इन किशोरों में पुलिस-प्रशासन का कोई भय नहीं था, तभी वे सरेआम चाकूबाजी करते रहे। देश की राष्ट्रीय राजधानी जहां के बारे में अकसर कहा जाता है कि पुलिस प्रशासन कानून व्यवस्था बनाने में अग्रणी रहता है, वहां यह घटना सामने आयी। सवाल उठाया जा सकता है कि देश के दूर-दराज के इलाकों में यह स्थिति कितनी गंभीर हो सकती है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि किशोरों की आपराधिक घटनाओं में तेजी से बढ़ती भूमिका की असली वजह क्या है? उल्लेखनीय है कि दयालपुर की घटना से पहले भी कई गंभीर अपराधों में किशोरों की संलिप्तता की घटनाएं गाहे-बगाहे सामने आती रही हैं। लेकिन किशोर अपराध से जुड़े कानून उन्हें जल्दी रिहा करा देते हैं।
दरअसल, देश में अकसर किशोरों के गंभीर अपराधों में लिप्त होने के चलते उनकी वयस्क होने की उम्र घटाने की मांग होती है। इसकी वजह यह है कि किशोर गंभीर अपराधों में संलिप्तता के बावजूद किशोर अपराध से जुड़े कानूनों के लचीलेपन के चलते जेल से जल्दी रिहा हो जाते हैं। जेल से बाहर आने के बाद फिर दूसरे गंभीर अपराधों में लिप्त हो जाते हैं। यह गंभीर मुद्दा है जिसके समाधान को केंद्र सरकार को अपनी प्राथमिकता बनाना चाहिए। दरअसल, इंटरनेट के तेजी से प्रसार और सोशल मीडिया में अपराधों से जुड़ी घातक सामग्री की उपलब्धता किशोरों में भटकाव को बढ़ावा दे रही है। हिंसक फिल्में और अन्य माध्यमों में अपराध के तौर-तरीके से जुड़ी सामग्री किशोर मन पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं। देश में संयुक्त परिवारों के बिखराव व बच्चों पर मां-बाप का नियंत्रण कम होने से कई किशोर बुरी संगति के चलते अपराधजगत की फिसलन में उतर जाते हैं। दूसरी ओर स्कूल-कालेजों में शिक्षकों की वह भूमिका नहीं रही, जो सख्ती से किशोरों के व्यवहार को नियंत्रित कर सके। आज उनकी सोच को मोबाइल व सोशल मीडिया पर प्रसारित विकृत सूचनाएं प्रभावित कर रही हैं। समाज के व्यवहार में एक किस्म की आक्रामकता नजर आती है। वहीं दूसरी ओर आपराधिक गिरोह व गैंग भी अपने आपराधिक कृत्यों को अंजाम देने कि लिए किशोरों का इस्तेमाल करते हैं। सवाल यह भी है कि किशोरों तक घातक हथियार कहां से और कैसे पहुंच रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, नशे की दलदल में फंसने वाले किशोर भी कालांतर नशा खरीदने के लिये पैसे जुटाने के लिये अपराध की गली में उतर जाते हैं। फिर गंभीर अपराधों को अंजाम देने लगते हैं। निश्चित रूप से बदलते वक्त के साथ पुलिस की भूमिका व कार्यशैली में बदलाव लाने की जरूरत है। साथ ही समाज में भी जागरूकता लानी आवश्यक है ताकि किशोरों को अपराध की राह पर बढ़ने से रोका जा सके। सरकार और समाज के साझे प्रयासों से ही इस संकट से उबरने में मदद मिल सकती है।

