दिल्ली विश्वविद्यालय के दक्षिण परिसर के निकट स्थित पांच मंजिला इमारत ढहने की घटना में मरने वाले छात्रों की संख्या सोमवार को सात घोषित की गई। अभी कुछ और छात्रों के मलबे में फंसे होने की आशंका है। कुंभकरणी नींद में सोई हुई राज्य सरकार अब जागी है। राजस्थान पहुंचकर पुलिस ने फरार हॉस्टल मालिक समेत तीन लोगों को गिरफ्तार दिखाया है। उनके खिलाफ गैर इरादतन हत्या, भवन के रखरखाव में लापरवाही बरतने और दूसरों की सुरक्षा खतरे में डालने के आरोप दर्ज किए गए हैं। वहीं दिल्ली की मुख्यमंत्री के निर्देश पर पांच अधिकारियों को निलंबित किया गया है। निलंबित किए गए अधिकारियों में दिल्ली नगर निगम के दक्षिण जोन के उपायुक्त, अधीक्षण अभियंता, अधिशासी अभियंता,सहायक अभियंता व कनिष्ठ अभियंता शामिल हैं। इतना ही नहीं, सरकार ने रविवार रात हुई घटना की मजिस्ट्रेटी जांच करने के भी आदेश दिए हैं। सवाल उठता है कि किसी जानलेवा हादसे के बाद ही ऐसी कार्रवाई करने की जरूरत क्यों पड़ती है? क्यों पहले ही बेगुनाह लोगों की जान से खिलवाड़ करने वाले भवनों की जांच करके मालिकों के विरुद्ध कार्रवाई नहीं की जाती? उन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं होती, जिनका दायित्व रिहाइशी भवनों व्यावसायिक भवनों में बदलने की जांच करना होता है? इस मुद्दे पर दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी से सहमत हुआ जा सकता है, जो उसने इस मुद्दे पर दायर जनहित याचिका पर सोमवार की सुनवाई के दौरान की। दिल्ली हाईकोर्ट ने दो टूक शब्दों में कहा कि इस हादसे के लिये सिर्फ भवन मालिक ही नहीं, बल्कि दिल्ली नगर निगम और दिल्ली विश्वविद्यालय भी जिम्मेदार है। विश्वविद्यालय अन्य राज्यों से आने वाले छात्रों के लिये रहने के लिये जरूरी सुविधा देने में विफल रहा है। जिसके कारण छात्रों को निजी पेइंग गेस्ट यानी पीजी में रहने को मजबूर होना पड़ रहा है। अदालत ने संबंधित विभागों को दस दिनों के भीतर याचिका पर जवाब दाखिल करने को कहा है। यह दुखदायक ही कहा जाएगा कि दिल्ली में पालम, विवेक विहार, साकेत, मालवीय नगर के बाद अब सत्य निकेतन का दुखद हादसा सामने आया है।
यह दुखद ही है कि दिल्ली में लगातार हो रहे हादसों की लिस्ट लगातार लंबी होती जा रही है। इन सभी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं में एक बात समान है –बेगुनाहों की मौत और असुरक्षित इमारतें, बिना मंजूरी के बदलाव, रिहायशी प्रॉपर्टी का व्यावसायिक इस्तेमाल और सबसे चिंताजनक नियम-कानून लागू करने में तंत्र की नाकामी। यह विडंबना ही है कि समाज में लोगों की मजबूरी का फायदा उठाकर पैसा कमाने की हवस इस हद तक बढ़ गई है कि वे किसी के जीवन व मृत्यु की भी परवाह नहीं करते। दूरदराज के राज्यों से अपने सुनहरे सपने लेकर दिल्ली आने वाले छात्र मजबूरी में मुंहमांगे दाम देकर अमानवीय स्थिति वाले पीजी में रहने को मजबूर हो जाते हैं। जब जर्जर इमारतों की स्थिति को नजरअंदाज करके चलताऊ निर्माण कार्य कराये जाते हैं तो हादसे का होना तय हो जाता है। हादसे का शिकार हुई सत्य निकेतन बिल्डिंग के लिये ग्राउंड फ्लोर और पहली मंजिल बनाने की अनुमति मिली थी। लेकिन नये प्लान की मंजूरी लिए बिना इसे पांच मंजिला बना दिया गया। क्या किसी एमसीडी के अधिकारी की नजर इस अवैध निर्माण पर नहीं गई होगी? जब दशकों पुरानी यह इमारत जमींदोज हुई तो तब कथित तौर पर इसमें अवैध रूप से रेनोवेशन का काम चल रहा था। देश की राजधानी में नियामक कानूनों या बिल्डिंग कोड की कमी नहीं है। सही मायने में कमी है तो बस उनके ईमानदारी से लागू करने की। सुरक्षित दिल्ली के लिये एक रोडमैप बनाने की जरूरत है। जिसमें पुरानी और ढांचागत रूप से बदली गई इमारतों का वार्ड के हिसाब से ऑडिट करने, खतरनाक इमारतों के मालिकों के खिलाफ तुरंत कार्रवाई करने, बिल्डिंग की मंजूरी का पारदर्शी रिकॉर्ड रखने और नियमों का उल्लंघन करने वाले अधिकारियों और मालिकों के लिये सख्त सजा का प्रावधान होना चाहिए। ट्रिपल इंजन सरकार वाली दिल्ली में यदि ऐसी त्रासदियां आम हो जाएं तो यह विडंबना ही है। कोशिश हो कि प्राथमिकता ऐसे हादसों को रोकना हो, न कि घटना के बाद प्रतिक्रिया देने का प्रपंच।

