यह शर्मनाक है कि जिस शहर को पिछले सात सालों से देश के सबसे स्वच्छ शहर का तमगा दिया जा रहा था, वहां पेयजल में सीवर का पानी मिल जाने से एक दर्जन से अधिक लोगों की मौत हो जाए। बताया जाता है कि इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में पेयजल आपूर्ति करने वाली पाइपलाइन में सीवर के पानी के रिसाव से हजारों लोगों का जीवन खतरे में पड़ गया। घटनाक्रम के बाद सौ के करीब लोग अस्पताल में भर्ती हुए और सैकड़ों लोग दूषित पेयजल के उपयोग से बीमार हैं। वैसे भी किसी सभ्य समाज में व्यक्ति आत्मग्लानि से यह सुनकर बीमार हो जाएगा कि जिस पानी को उसने उपयोग किया, उसमें सीवर का गंदा पानी मिला था। निस्संदेह, यह गंभीर प्रशासनिक लापरवाही ही है, जिसके चलते हजारों लोगों का जीवन संकट में पड़ गया। नगर निगम ही नहीं, इस महकमे से जुड़े सभी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। दरअसल, इंदौर लगातार भारत के सबसे स्वच्छ शहर का दर्जा हासिल करता रहा है तो इस दुर्घटना ने पूरे प्रकरण को राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खी बना दिया। इस दुखद स्थिति के चलते मानवाधिकार आयोग और मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करने के लिये बाध्य होना पड़ा। विडंबना यह है कि नागरिकों ने पहले ही दूषित पेयजल आपूर्ति की शिकायत की थी, लेकिन नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिये जवाबदेह अधिकारी तब हरकत में आए, जब कई लोगों की जान जा चुकी थी। यहां तक कि इस निर्वाचन क्षेत्र के प्रतिनिधि और राज्य के नगरीय विकास मंत्री, जिनके अधीन पेयजल आपूर्ति का महकमा आता है, उनकी संवेदनहीन बयानबाजी ने लोगों का आक्रोश बढ़ाया है। हालांकि, तल्ख आलोचना के बाद मंत्री ने खेद जताया है। यहां तक कि इस घटना के बाद मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी वरिष्ठ भाजपा नेत्री उमा भारती ने भी दोषियों से प्रायश्चित करने व दंड देने की मांग की है। लेकिन सवाल यह है कि क्या कुछ छोटे स्तर के अधिकारियों के निलंबन और स्थानांतरण से इन मौतों के लिये जिम्मेदार लोगों का प्रायश्चित हो पाएगा?
लेकिन विडंबना है कि यह समस्या केवल इंदौर तक ही सीमित नहीं है, बल्कि देश के छोटे-बड़े शहरों में गाहे-बगाहे दूषित जल आपूर्ति के मामले प्रकाश में आते रहे हैं। दुर्घटना के बाद जांच समितियों का गठन, मुआवजे की घोषणा और कनिष्ठ अधिकारियों का निलंबन मामले में लीपापोती का उपक्रम बन चुका है। नववर्ष की पूर्व संध्या पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘सुधार, क्रियान्वयन और रूपांतरण’ के मंत्र पर जोर दिया था। तब उन्होंने प्रक्रियाओं को सरल बनाने और जीवनयापन को सुगम बनाने के लिये प्रणालियों को अधिक अनुकूल बनाने की आवश्यकता पर भी बल दिया था। सवाल है कि जब नागरिकों को स्वच्छ हवा और जल जैसी बुनियादी आवश्यकताओं से वंचित रखा जाएगा तो जीवनयापन को सुगम कैसे बनाया जा सकता है? मध्य प्रदेश की दोहरे इंजन वाली सरकार इस मोर्चे पर पूरी तरह से विफल रही है। कोई भी बड़ी योजना व नारा तब तक अर्थहीन है जब तक उन्हें जमीनी स्तर पर ठोस कार्रवाई का समर्थन प्राप्त न हो। सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार अनुच्छेद-21 के तरह जीवन के मौलिक अधिकार का हिस्सा है। इंदौर की त्रासदी दर्शाती है कि शहरी बुनियादी ढांचे के खराब रखरखाव के कारण इस अधिकार का उल्लंघन कितनी आसानी से हो सकता है। निष्कर्ष यह भी है कि स्वच्छता रैंकिंग, स्मार्ट सिटी के दावे और शासन संबंधी नारे व्यवस्थागत नाकामी को छिपा नहीं सकते। इंदौर की घटना के बाद देश के सभी राज्यों में संबंधित विभागों व स्थानीय निकायों को पेयजल से जुड़ी व्यवस्था का ध्यान रखना होगा कि कहीं पेयजल आपूर्ति लाइन जर्जर होकर दूषित पानी से तो नहीं मिल रही है। पेयजल आपूर्ति करने वाली मुख्य पाइप लाइनों का नियमित रूप से अवलोकन होना चाहिए। इस बाबत मंत्रालय और निकाय के अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। ऐसे गंभीर मामलों में लापरवाही के दोषियों को सख्त सजा देने का भी प्रावधान होना चाहिए। यह मामला गैर इरादतन हत्या जैसा भी तो है।

